कृष्ण जन्माष्टमी पर छोटे-बडें- निबंध Essay

कृष्ण जन्माष्टमी पर छोटे-बडें निबंध 

(Short and Long Essay on Krishna Janmashtami in Hindi)

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर निबंध :

भारतीय वेद व  पुराणों के अनुसार सतयुग,द्वापर ,त्रेता और कलियुग इन चार युगों में समयकाल विभाजित किया गया है।जब-जब पृथ्वी पर दुष्टों एवं राक्षसों का प्रकोप बढ़ जाता है,धर्म का नाश होने लगता है,दुष्ट राजा लोग जनता को सताते हैं। अधरम बढ़ने लगता है तब तब हर युग में  भगवन दुष्टों,राक्षसों  का वध करने एवं धर्म को स्थापित करने के लिए ,सज्जन पुरुष ,साधु लोगों की पीड़ा हरने के लिए मनुष्य आदि के रूप में पृथ्वी पर अवतार लेते हैं। 

हमारे पुराणों के अनुसार जब द्वापर युग के अंत में पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ गया लोग अधर्मी और अभिमानी हो गए तथा दुष्ट राक्षस लोग मनुष्य के रूप में राजा बन कर पृथ्वी पर राज करके चारों ओर अत्याचार करने लगे। प्रजा और साधु संत लोग कहीं भी सुख से नहीं रह पा रही थी। हर जगह अत्याचार और अधर्म ही हो रहा था। लोग स्वयं को ही भगवन समझने लगे थे। 

मथुरा का राजा था कंस जो बहुत शक्तिशाली और दुष्ट था। वह नित्य अपनी प्रजा को कष्ट देता उन्हें दुखी रखता था।उसका अभिमान इतना बढ़ गया था कि वह देवताओं तक को कष्ट पहुँचाता था। चारों दिशाओं में उसके ही  गूंज थी। यदि कोई भी उसके खिलाफ बोलता तो वह उसे मृत्यदंड दे देता था।  

द्वापर युग के अंत में भगवान विष्णु ने भाद्रपद माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि में मथुरा नगर के राजा कंस के कारागृह में श्री कृष्ण के रूप में जन्म लिया।अतः हर वर्ष भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष को जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। 

श्री कृष्ण के जन्म दिवस के रूप में हर वर्ष भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष को कृष्ण जन्माष्टमी हर्षोल्लास के साथ पुरे भारत में मनाया जाता है। यह त्योहार हिंदु धर्म की अखंड परंपरा को दर्शाता है व सनातन धर्म का बहुत बड़ा पवित्र ,श्रद्धा ,भक्ति प्रेम का त्योहार है। यही नहीं यह त्यौहार  भारत से दूर अन्य देशों में बसे भारतीय भी इस त्योहार को धूम-धाम से ख़ुशी से मनाते हैं।

श्री कृष्ण का जन्म उत्तरप्रदेश की मथुरा पावन नगरी में हुआ था। श्री कृष्ण जी का आकाश के समान नीला रूप भगवान की असीम क्षमता और शक्ति को दर्शाता है। उनके तन का पीला वस्त्र धरती के रंग रूप का वर्णन प्रकट करता है।  एक शुद्ध, अनंत शक्ति चेतना का रूप लेकर कृष्ण जी का पृथ्वी पर जन्म हुआ था जिन्होंने बुराईयों का अंत किया और अच्छाई को पुनर्जीवित किया तथा धर्म को स्थापित किया। 

कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हर कोई भगवान के दर्शन करने के लिए बधाई देने के लिए उनकी जन्म भूमि मथुरा में आता है। दूर दूर से भक्तजन बाल रूप भगवांन श्री कृष्ण के दर्शन करने आते हैं और अपने मंगलमय जीवन की कामना करते हैं। हमें अपने बच्चों को जन्माष्टमी और कृष्णा की महिमा की कहानी बताकर उन्हें इस पवित्र पर्व का महत्व अवश्य ही  बताना चाहिए।

अतः आपके इस कार्य में हेल्प करने के लिए मैंने यहाँ कृष्ण जन्माष्टमी का निबंध हिंदी में प्रस्तुत किया है, इसे आप अपने बच्चों के साथ जरूर बाँट सकते हैं` और ये आपके बच्चों के स्कूल के कार्य में भी काफी हेल्प करने वाला साबित होगा। 

जन्माष्टमी पर निबंध हिंदी में (Essay on Janmastami in Hindi)

श्री कृष्ण जी जिन्हें हम प्रेम से गोविंद, बालगोपाल, कान्हा, लड्डू गोपाल, माखन चोर और अन्य  सहस्त्र नामों  से भी पुकारते हैं। वेद पुराणों के अनुसार श्री कृष्ण का जन्म आज से लगभग 5 हजार साल पहले मथुरा नगरी के कंस राजा की कारागार में हुआ था। श्री कृष्ण जी देवकी और वासुदेव के आठवीं संतान थे। लेकिन उनका पालन पोषण यशोदा मैया और नन्द जी के द्वारा गोकुल में हुआ था। 

श्री कृष्ण जी भगवन विष्णु के अवतार माने जाते हैं। द्वापर के अंत में भगवान ने पृथ्वी पर हो रहे अत्याचार , दुष्टों , राक्षसों का , बुराइयों का अंत करने तथा धर्म की  स्थापना करने के लिए , अपनी शक्ति और अद्भुत आश्चर्यजनक सौंदर्य के साथ  श्री कृष्ण के रूप में अवतार लिया था। 

भगवान श्री कृष्ण का अवतार हुआ था से आशय है कि भगवान का जन्म मनुष्यों या अन्य जीवों की तरह नही होता है वह प्रकट होते हैं अपने स्वरुप  के साथ। भगवांन का जन्म किसी न किसी खास उद्देश्य के पूर्ण करने लिए होता है। भगवान हमेशा अपने भक्तों ,प्रेमी की प्रार्थना से ही ,उनके प्यार की करूण पुकार से ही प्रकट हुआ करते हैं। 

भारत शुरू से ही देवी देवताओं की भूमि मानी जाती है जहाँ विभिन्न प्रकार से देवी देवताओं की पूजा अर्चना की जाती है।  दुनिया में सबसे ज्यादा त्यौहार भारत में ही मनाये जाते  हैं  और हर त्यौहार के पीछे देवी देवताओं की  कोई ना कोई पौराणिक कथाएँ  भी जुडी होती हैं। जो मनुष्यों को सही ज्ञान और मानवता का धर्म सिखाती हैं। 

यह कथाएं  हर वेद , पुराण में पाये जाते हैं जो गुरु, शिक्षक और माता पिता द्वारा हम तक पहुँचते हैं। भगवन श्री कृष्ण से जुडी त्रिलोक पावनि कथा है जिसे सुनकर,भगवान कृष्ण के कार्यों को याद करके प्रेमी  प्रेम में डूब जाता है भक्ति में खो जाता है। भगवान की कथा  लोगों का कल्याण,विश्व का कल्याण  करने वाली होती है। मानव को उन्हें सच्चे मार्ग पर ले जाने वाली होती है ,परस्पर प्रेम व स्नेह  के साथ रहना सिखाती है ,अज्ञानता को दूर करती है सुख पहुंचाती हैं।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की कथा :

मथुरा नगरी का एक राजा था जिसका नाम था कंस। कंस राजा बड़ा ही दुष्ट और राक्षस प्रकृति का था। वह सदा लोगों पर अत्याचार किया करता था। उसके राज्य की प्रजा व किसान बहुत ही दुखी से उसके शासन की नीतियों से। सभी जगह अधर्म ही हुआ करता था। लोगों को व्यर्थ ही परेशान किया जाता उन्हें कष्ट दिया जाता। किसानों से अधिक और मनमाना कर लिया जाता था।

राजा कंस के राज्य में मनुष्य तो छोड़ो देवी देवता भी उसके करतूतों से बहुत ही दुखी थे क्योंकि कंस अत्यंत शक्तिशाली राजा था जिससे किसी का भी जीतना  नामुमकिन था। राजा कंस के दरवार में उसी की तरह अन्य मंत्री और सैनिक भी दुष्ट और निर्दयी थे जो प्रजा को ,साधु लोगों को दिन रात कष्ट पहुँचाते थे।

द्वापर के अंत में सम्पूर्ण पृथ्वी पर  इसी प्रकार के राजाओं का राज था और चारों  तरफ पाप ही पाप किया जा रहा था। प्रजा दुखी और कष्ट में थी दुष्ट लोग मौज मना  रहे थे। धरती भी इन दुष्टो के कार्यों से दुखी हो गयी थी। तब भगवान के प्रेमी ,भक्तों ने ,सज्जनो ने भगवान से इनके नाश करने की प्रार्थना की। बुराई का नाश करने की प्रार्थना की ,धर्म की स्थापना करने की प्रार्थना की। 

राजा कंस की बहिन का नाम था देवकी। कंस देवकी से बहुत ही लाड प्यार और दुलार करता था। वह एक अच्छे भाई की तरह अपनी बहिन का ख्याल करता था। जब देवकी का विवाह वासुदेव के साथ हुआ तब कंस उसे विदा करने स्वयं ही चला और वासुदेव का रथ स्वयं ही ख़ुशी ख़ुशी हांकने लगा। उसका यह प्रेम देखकर सभी लोग उसकी भूरी भूरी प्रशंसा करने लगे। 

जब वह देवकी जी का रथ चला रहा था तभी आकाश में एक गंभीर आकशवाणी हुई जिसने कहा “जिस बहिन को तू इतने प्रेम से विदा करने जा रहा है ,उसी की आठवीं संतान तेरा काल बनेगी अर्थात वही तेरा अंत करेगा”,यह सुनते ही वह दुष्ट पापी पागल हो गया और अपने मयान से  तलवार निकाल कर अपनी बहिन देवकी का बध करने के लिए बढ़ा। 

तभी देवकी के पति वासुदेव ने कंस के पैर पकड़ कर उसकी स्तुति की , उसकी वीर गाथा कही तथा उससे देवकी को न मारने की प्रार्थना की। वासुदेव जी ने कहा कि ” देवकी आपकी छोटी बहिन है जो आपकी दुलारी भी है उसे मत मारिये ,आपको उसके पुत्रों से भय है न कि देवकी से , सो में उसके जन्मे प्रत्येक बच्चे को आपको सौंप दूंगा ,यह में आपसे प्रतिज्ञा करता हूँ, महाराज उसे छोड़ दीजिये”  

राजा कंस ने वासुदेव की प्रतिज्ञा का विचार करते हुए और उनकी सत्यता को समझते हुए उसने तलवार वापिस म्यान में रख ली। लेकिन उसे फिर वासुदेव पर विश्वास नहीं कर पाया। उसने दोनों को अपने कारावास में कैद कर दिया। जिससे वह देवकी की होने वाली प्रत्येक संतान पर नज़र रख सके।

लेकिन वह पापी दुष्ट कंस मौत से बुहुत ही डरता था इसलिए उसने देवकी से होने वाली प्रत्येक संतान की हत्या करता जाता था। जबकि आकाशवाणी  में आठवीं संतान से मृत्यु का भी था। 

समयानुसार ,भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अष्टमी की अर्द्धरात्रि में कारावास में देवकी को आठवीं संतान हुई लेकिन यह संतान स्वयं भगवान थे जो उस कारावास में  अत्यंत देदीप्यवान सांवले सूंदर बालक के रूप में प्रकट हुए। माँ देवकी ने भगवान् के इस रूप को देखकर हर्षित भी होती थी और दुखी भी होती थी कि कहीं कंस की नज़र न पड़  जाए,देवकी जी उस बालक को अपने  बस्त्रों में छुपाने लगीं की इसके प्रकाश से कहीं कोई सैनिक जग न जाए।  

भगवान् की अलोकिक शक्तियों से वासुदेव परिचित थे। भगवान् की प्रेरणा से वासुदेव जी कृष्ण जी को नंद के यहाँ गोकुल पहुंचाने का निश्चय किया और उसे उठाकर अपने सिर पर रखकर जाने लगे तब तुरंत ही उनके हांथों पैरों के बेड़ियाँ और  कारावास के दरवाज़े स्वयं ही खुल गए।

उस  मूसलाधार बारिश की काली रात्रि में पूरी मथुरा नगरी सोई हुई थी। सैनिक भी सोये हुए थे इसलिए बिना बाधा के वासुदेव जी नगर से बाहर आ गए। यमुना  भी उस समय खूब उफान पर थी लेकिन जैसे ही वासुदेव जी कृष्ण को लेकर यमुना के समीप आये तो यमुना का पानी कम हीनहीं हुआ वरन उसने उन्हें रास्ता भी दे दिया जिससे वो नदी के उस पार बड़ी ही आसानी से पहुंच जायँ। 

 

 
इस प्रकार से वासुदेव जी उस तूफानी भयानक रात में सकुशल गोकुल पहुंचे। उस रात में सारा गोकुल भी सोया हुआ था।सबके छुपते चुपचाप वासुदेव जी  नन्द बाबा के घर गए ,उस रात मैया यशोदा को भी एक पुत्री हुई थी। वासुदेव जी ने चुपके से अपने बालक श्री कृष्ण को उस कन्या के स्थान पर लिटा दिया और कन्या को उठाकर वहां से बड़ी ही सावधानी से नन्द के घर से निकलकर अपने मथुरा में आ गए। 
 
आते समय भी भगवान की प्रेरणा से सभी सैनिक और मथुरा वासी सोये हुए ही थे। वासुदेव जी जैसे ही अपने बंदी ग्रह में उस कन्या को लेकर पहुंचे तो पहले की तरह उनके और देवकी के हांथों और पेरो में बेड़ी लग गयीं और जेल के दरवाजे भी स्वतः ही पहले की तरह बंद हो गए। 
 
जिस समय श्री कृष्ण जी को वासुदेव जी अपने सर पर रख कर गोकुल जा रहे थे उस समय भरी बारिश हो रही थी। भगवान श्री कृष्ण बारिश से न भींगे तो  शेष भगवान जी ने उन पर अपने फनों से छत्र छाया करते रहे। जिससे भगवान श्री कृष्ण भीगे नहीं। और यमुना ने भी अपने प्रभु को पहचानकर उन्हें रास्ता दिया जिससे वासुदेव जी पानी में डूबे नहीं। 
 
उसके बाद उस कन्या ने रुदन शुरू किया। जैसे ही कन्या का रुदन शुरू हुआ तुरंत ही सभी सैनिक सोते हुए से जागे और तुरंत ही कंस को बच्चे के जन्म होने की सुचना दी। कंस बड़ी ही व्याकुल होकर बंदीगृह में आया और उस कन्या को देवकी जी की गोद से छीन लिया। तब देवकी जी ने रोते हुए कहा भाई यह तो कन्या है इसे तो मत मारो इसने क्या बिगाड़ा है ?आपको तो पुत्र से भय है। 
 
लेकिन कंस ने उस कन्या को पत्थर पर उठा कर पटक दिया। वह कन्या उसके हाथ से छूट कर आकाश में स्थित होकर नव देवी के रुप में प्रकट होकर कंस से बोली “रे दुष्ट !मुझ पर तू व्यर्थ ही शस्त्र उठाता है ,तेरा काल तो गोकुल में जन्म ले चूका है। जो समय आने पर तेरा नाश करेगा। “
 
यह सुनकर कंस भयभीत  हो जाता है और वह अपने अनुचरों और सहायकों को गोकुल में श्री कृष्ण को ढूढ़ने और उन्हें मारने का आदेश देता है। लेकिन वह अपने अनेक प्रयासों के बाबजूद श्री कृष्ण को नहीं मार पाता है। फिर वह दिन आता है जब वह श्री कृष्ण को बुलाकर धोखे से उन्हें मारने का प्रयास करता है। परन्तु श्री कृष्ण और बलराम कंस के इस मौत के खेल को खेल खेल ही में समाप्त कर देते हैं। और फिर श्री कृष्ण छलांग लगाकर उस कंस को उसके सिंघासन सहित नीचे पटक देते हैं और उस पापी के प्राण हर लेते हैं। मनुष्य और देवता भी इस कठिन कार्य के सम्पन होने से हर्षित होकर उन पर फूलों की वर्षा करते हैं और जय जय कार करके उनके गुण गाते हैं। 
 
यह सब कार्य कृष्ण जी ने अपनी मात्र सात वर्ष की आयु में ही किऐ थे । जिससे लोग उनके इस अलौकिक कार्य को याद् करके प्रसन्न होते हैं और प्रेम से आंसू बहाते हैं। इस प्रकार से श्री कृष्ण ने बुराई को मारकर अच्छाई को जीवित किया। सिर्फ मनुष्य ही नहीं देवताओं को भी श्री कृष्ण ने सुख दिया। अपने माता पिता को कारावास से छुडाया।मथुरा की प्रजा अति सुखी हुई कंस का  अंत होने से। 
 
इस प्रकार से भगवान ने और भी अनेक अलौकिक कार्य किये तथा इस पृथ्वीसे दुष्टों का नाश  और बुराई का अंत किया। अधर्मी लोगों को मारा और धर्म की ,सत्य की स्थापना की। इस प्रकार से जब जब पृथ्वी पर अत्यचार बढ़ता है ,अधम अभिमानी बढ़ जाते हैं मनुष्य कष्ट पाते हैं दुखी होते हैं ,अधर्म बढ़ जाता है तब तब भगवान किसी न किसी रूप में अवतार लेकर पृथ्वी से इसी प्रकर सभी बुराइयों का अंत करते हैं। 
 
 

जन्माष्टमी 2020 में कब है?

बैसे तो जन्माष्टमी हर साल अगस्त या सितम्बर के महीने में मनाई पड़ती  है। लेकिन फिर भी भादों का महिना आते ही हम सब के मन में बस एक ही सवाल आता है की  कृष्ण जन्माष्टमी कब है? और किस दिन है?

सभी बच्चे भी बड़े ही उत्साह से पूछते हैं कि श्री कृष्ण जन्माष्टमी आज है या कल? तो हम आपको बता दें की इस वर्ष  कृष्ण जन्माष्टमी 2020 में 11 अगस्त मंगलवार को मनाई जाएगी बड़े ही धूमधाम से हर्सोल्लास के साथ अपने अपने घरो में ,मंदिरों में मनाई जायगी। और हमेशा की तरह सबसे पहले मंदिरों में मनाई जायगी और फिर उसके बाद अपने अपने घरों में  श्री कृष्ण का जन्मदिवस मनाया जायगा।

भगवान श्री कृष्ण जी का जन्म रात के 12 बजे हुआ था।  हिन्दू कैलेंडर के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी भादों  माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन रोहिणी नक्षत्र में पड़ती है। कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव को पूरी दुनिया में बड़ी आस्था और श्रद्धा भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर देश व विदेश से प्रतिवर्ष हजारों लाखों श्रद्धालु भगवान कृष्ण का जन्म दिन मानाने के  लिए मथुरा जाते हैं। 

कृष्ण जन्माष्टमी कैसे मनाते हैं?

कृष्ण जन्माष्टमी के आगमन से पहले ही उसकी तैयारियाँ पुरे जोर-शोर से आरंभ कर दी जाती हैं। पुरे विश्व में इस त्यौहार का उत्साह और ख़ुशी देखने योग्य होता है। 

कृष्ण जन्माष्टमी के दिन मंदिरों को खूब सजाया जाता है।  कृष्ण जन्माष्टमी से एक दिन पहले सप्तमी के दिन लोग पूरा दिन व्रत रखते हैं और आधी रात 12 बजे मंदिरों में कृष्ण का जन्म होने के बाद घंटियाँ ,शंख , ढोल आदि संगीत बजाकर श्री कृष्ण की जन्माष्टमी आरती की जाती है तथा भजन कीर्तन किये जाते हैं। 

अधिकतर  लोगो का ये सवाल होता है की कृष्ण जन्माष्टमी में क्या खाना चाहिए?कृष्ण जन्माष्टमी में बहुत से श्रद्धालु भक्त निर्जल उपवास रखते हैं और रात्रि 12 बजे  भगवान् का जन्म  के बाद ही अपना उपवास तोड़ते हैं। वहीँ बहुत से भक्त बिना निर्जल उपवास रखते हैं , धान और नमक का त्याग कर व्रत रखते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी  व्रत में भक्त सेंधा नमक से बनी साबूदाने की खिचड़ी और साबूदाने की खीर , दही वडा, समक चावल के खीर, इत्यादि फलाहार चीजें भी खा सकते हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी के दिन व्रत रखने से भगवान् की कृपा और घर में सुख-समृद्धि और शांति आती है।  इस दिन मंदिरों में और घरों में तरह तरह की झाकियाँ सजाई जाती हैं  और भगवान श्री कृष्ण को झुला भी झुलाया जाता है। 

कृष्ण जन्माष्टमी का असली  उत्सव मध्यरात्रि के दौरान शुरू होता है क्योंकि श्रीकृष्ण का जन्म अपने मामा कंस के कारावास में मथुरा नगरी में आधी रात्रि में  हुआ था। पूरे भारत में इस दिन को भक्ति गीतों और नृत्यों, पूजाओं, आरती, शंख की ध्वनि और संगीत के साथ  श्रीकृष्ण की पालकी के साथ मनाया जाता है। 

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन भारत में जगहों  जगहों पर दही-हांडी प्रतियोगिता का आयोजन  भी किया जात है।  इसमें नन्हे बालक श्री कृष्ण की भेषभूषा पहनकर गोविंदा बनकर  मटकी फोडने जाते हैं। और लोग इस प्रतियोगिता का आनंद देख देख कर आनंद लेते हैं। इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन की कृष्ण जन्माष्टमी विश्व प्रसिद्द है जिसे देखने व कृष्ण जी के अद्भुत दर्शन कने लोग देश विदेश से आते  हैं। 

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन प्रायः सभी विद्यालयों, संस्थाओं आदि में कृष्ण जन्माष्टमी का अवकाश मनाया जाता  है।  इस दिन , दिन भर अलग अलग स्थानों पर विद्वानों,पंडितों ,संतों  के प्रवचन, श्रीमद्भागवत की कथा और जन्माष्टमी की कथा और इस अवसर पर भजन कीर्तन, उपदेश आदि सुनने को मिलतें है। 

कृष्ण जन्माष्टमी  वर्ष में एक बार भादों की पावन वर्षा  ऋतू में आकर यह त्यौहार हम सभी के मन में धर्म ,सदाचार अच्छे विचारों की स्थापना तथा अधर्म ,अत्याचार-पापाचार के विनाश के लिए सीख देता है तथा सच्चे कर्तव्य के लिए सभी को प्रेरित करता है। 

>रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है पुराणों के अनुसार

कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व

हिन्दू धर्म में हर त्यौहार और हर व्रत का अपना बिशेष महत्व होता है उसी तरह जन्माष्टमी का भी विशेष महत्व है।  धरती से पापों , अत्याचार और हिंसा आदि को मिटाने के लिए श्री कृष्ण जी ने पृथ्वी पर अवतार लिया था। जब कंस का अत्याचार और पाप अपनी चरम सीमा पर पहुँचे तब कृष्ण जी ने उसका वध करके मानव जीवन और धर्म की रक्षा की थी। 

तो इस प्रकार से कृष्ण जन्माष्टमी पर्व हमें सच्चाई, अहिंसा और धर्म के पालन करने का सच्चा संदेश देता है। यह त्यौहार श्री कृष्ण के दिखाये गए मार्ग ,कर्तव्यों  पर चलने और उनके आदर्शों का पालन कर मानवजाति के उत्थान के लिए ,कल्याण के लिए ,सच्चे सुख व आंनद के लिए इस जगत को प्रेरित  करता है। 

यह कृष्ण जन्माष्टमी  हमें जहाँ एक और श्री कृष्ण के बाल रूप की अद्भुत अलौकिक लीलाओं का स्मरण कराता है साथ ही अपना उचित अधिकार पाने के लिए कड़े संघर्ष और कर्म के महत्व की सीख भी देता है। 

भगवान श्री कृष्ण जन्मदिवस की याद में और उनके बाल रूप को पूजने के लिए यह पावन पर्व कृष्ण जन्माष्टमी मनाया जाता है। 

जन्माष्टमी पर निबंध हिंदी में” कृष्ण जी के जन्म की कथा आदि अच्छे से समझ आया होगा। इसे आप अपने बच्चों  तथा  ज्यादा से ज्यादा लोगों के साथ जरुर जरुर शेयर करें ताकि उन सबको भी कृष्ण जन्माष्टमी की इस अद्भुत अलौकिक कहानी की सही जानकारी मिल सके और उसका असली महत्व समझ सकें।  

 

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