Friendship Day फ्रेंडशिप डे क्यों मनाते हैं ?

बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके मन में इस प्रकार का सवाल अवश्य आता है कि आखिर यह मित्रता दिवस मतलब फ्रेंड्शिप डे  क्यों मनाते हैं ? कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो मनाते तो हैं पर जनकारी नहीं है क्यों मनाते हैं?लेकिन सच बात तो यह है कि “दोस्तों के बिना तो ज़िंदगी अधूरी सी ही रहती है ” क्योंकि यह रिश्ता अनमोल होता है जो कभी कभी तो  सगे खून के रिश्ते से भी बढ़कर हो जाता  हैं ! 
 
कुछ लोगों के लिए तो वास्तव में यह खून के रिश्ते से भी बढ़कर है क्योंकि कई बार सगे काम में नहीं आते समय पर यह दोस्त ही हैं जो अपनी जान तक देने को तैयार हो जाते हैं। एक सच्चा दोस्त होना मानव जीवन की सबसे बड़ी अनमोल उपलब्धि होती है जो हर किसी  के पास नहीं होती यह तो बड़े ही भाग्यों से मिलती है! क्या आपका भी है ऐसा कोई मित्र जो आप के लिए समय आने पर जान की परवाह भी नहीं कर सकता? कमेंट करके जरूर बताएं। 
 
तो आज के इस लेख में हम  Friendship Day की सम्पूर्ण चर्चा जरने जा रहे हैं। इस डे को आज विश्व के लगभग सभी देश अपने अपने तरीके से मानते हैं। लेकिन क्या आपको पता  है कि आखिर इसका इतिहास क्या है? मतलब यह कब स्टार्ट हुआ था और कैसे यह चलन में आया आदि ? यदि नहीं तो चलिए हम आपको इसके बारे में विस्तृत जानकारी देते हैं :

फ्रेंडशिप डे क्या है - What is Friendship Day in Hindi ?

फ्रेंडशिप डे सबसे बड़ी खास बात यह है कि यह हर साल अगस्त के संडे को ही मनाया जाता है। इस दन सभी मित्र आपस में मलकर के Celebrate करते हैं। सभी उम्र के लोग फिर चाहे वो छोटे बच्चे हों या फिर वुजुर्ग हों एक दूसरे से मिलकर अपनी दोस्ती की अहमियत बताते हैं और उपहार स्वरूप gift देकर अपना प्रेम भी दर्शाते हैं।
 
तो क्या आप जानते हैं कि मित्रता दिवस सबसे पहले कब शुरू हुआ था ?
 
सर्वप्रथम  Friendship Day, World में 1958 को Celebrate किया गया था। 

Friendship Day क्यों मनाते हैं?

दोस्त जीवन का सबसे अनमोल उपहार होते हैं जो हमेशा साथ और काम में आने वाले होते हैं जिनका एहसान शायद ही कभी चुकाया जा सकता है। ऐसे में इस दिन को आपस की दोस्ती को सेलिब्रेट किया जाता है। एक दूसरे के प्यार और विस्वास का सम्मान किया जाता है। एक दूसरे के लिए कितना प्रेम है इस दिन दर्शाया है और अन्य लोगों के लिए मिशाल पेश करते हैं। 
 
दोस्ती में अपनापन , प्यार की भावना , सम्मान की भावना , विस्वास और ईमानदारी आदि की भावना के खास गुण होते हैं जो दोस्ती को मजबूत करती है।यदि ऐसा दोस्त कोई रूठा हो तो इस दिन उसे भी मना लेते हैं -उसे उपहार देकर , अपनी मजबूत दोस्ती के उदाहरण देकर। 

Friendship Day कैसे मनाते हैं ?

दोस्तों अब बात करते हैं कि इसे किस प्रकार से सेलिब्रेट  जाता है ? आजकल मार्किट में बहुत सारे ऐसे गिफ्ट पहले ही आ आजाते हैं जो मित्र दिवस या Friendship Day के दिन एक दूसरे को दिए जाते हैं। जिसमें सबसे ज़्यादा trend में है “Friendship Band” , इस Band को सिर्फ अपने पुराने मित्र को ही नहीं , नए दोस्त को भी दे सकते हैं, या फिर आप किसी को मित्र बनाना चाहते हैं तो भी इस band  के द्वारा हम बना सकते हैं उनके हाथों में पहना कर। 
 
बाजार में ढेर सारे उपहारों की भरमार होती है जो हम अपने दोस्तों को गिफ्ट के रूप में दे सकते हैं। दोस्त के फेस वाले T-shirt, Mug आदि भी खूब Trend करते हैं। सोशल मीडिया के अलावा by hand भी गिफ्ट कार्ड दिए जाते हैं।
 
कुछ लोग पार्टी भी किया करते हैं और बहार जाकर get together भी करते हैं और इस  दिन को खूब एन्जॉय करते हैं और आगे के लिए भी अपनी दोस्ती को और मजबूत करते हैं।

Friendship Day कैसे मनाते हैं ?

दुनिया सबसे पहले `इस डे की शुरुआत वर्ष 1958 में पेराग्वे से हुई जो कि एक अंतरष्ट्रीय Friendship Day के रूप में भी मनाया गया था। 
 
शुरुआत में Friendship Day चिट्टी -पत्री, ग्रीटिंग कार्ड आदि से WISH देकर मनाया जाता था। और इसका भी खूब दिलचस्प जमाना रहा। उसके बाद धीरे -धीरे फ़ोन इंटर्नेट ने एक अलग ही शुरुआत की जबकि “पेन पाल” का विकसित रूप है यह आधुनिक सोशल मीडिया जैसे Facebook , Whats-app , Twitter , Instagram आदि। 
 
ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले इस दिवस को मनाने का ख्याल “डॉ रामन आर्टिमियो बेक्रो “के मन आया था जो की उन्होंने एक मित्र गोष्ठी में बैठक लिया था। जिसका नाम “वर्ल्ड मैत्री क्रूसेड” था जिसमें भेदभाव के सबको सम्मिलित किया गया था।   

Friendship Day की शुरुआत कहाँ और कैसे हुई?

 ऐसा माना जाता है कि एक बार अमेरिकी में किसी व्यक्ति को 1935 में उसके  लिए मृत्युदंड दिया गया। इस व्यक्ति एक सच्चा दोस्त था जब इसको उसकी बात पता चली  तो इतना दुखी हुआ कि उसने  suicide कर ली। तब लोगों ने उसकी दोस्ती की खूब वाहवाही की और वहां की सरकार ने दोस्ती की इस मिशाल को लेकर उस दिन को ही मित्र दिवस घोषित किया जो  कि अगस्त का पहला संडे था। बस उसी दिन से लोग इसे हर वर्ष मानाने लगाने। 
 
तो इस तरह से यह Friendship Day अमेरिका से 1935 में शुरू हुआ और फिर धीरे धीरे विश्व का अन्य देशों में भी यह चलन में आता गया। और आज भारत सहित बहुत से देश इस दिन को विभिन्न तरीके से celebrate करते हैं।
 
 
 
 

Friendship Day का क्या मकसद है?

riendship Day एक ऐसा दिन है जिसमें आप अपने कीसी भी मित्र फिर चाहे वो दूर हो या पास हो ,उसे याद दिलाने का दिन है कि “दोस्त तू मेरी ज़िंदगी के लिए कितना महत्वूर्ण है ” तेरे बिना ज़िंदगी बेरंग सी होती है। जीवन में किसी सच्चे मित्र का मिलना एक अनमोल उपहार होता है। जो हर किसी को नहो मिलता है जिसे मिलता है वही इसकी कीमत समझ सकता है। 
 
एक दोस्त ही तो होता है जो आपके हर अच्छे बुरे समय में साथ आता है , सदैव आपके संग खड़ा होता है। अपनी जान की परवाह किये बिना भी आपकी मदद करता है। तो भला ऐसा मित्र जिसेक पास है उसकी ज़िंदगी में कभी दुःख आ ही नहीं सकते। 
 
तो ऐसे मित्रो के लिए एक दन तो खास बनता ही है जिसमें हम कह सकें की तू कितना खास है मेरे लिए। बेसे तो ऐसे दोस्तों के लिए तो यह एक दिन भी कम है।   
 
तो दोस्ती के बिना ज़िंदगी ज़िंदगी ही नहीं है , भगवांन का शुक्रिया है कि उसने यह बहुत ही प्यारा और खूबसूरत रिश्ता बनाया है क्योंकि –
 
  • दोस्त ही होते हैं जो आपके उस समय भी खड़े होते है जब अपने भी साथ छोड़ देते हैं। 
  • दोस्त ही होते हैं जो आपके गलत होने पर भी आपका साथ देते हैं। 
  • दोस्त ही होते हैं जब आप रो रहे होते हैं तब वो आपको हंसाते हैं फिर चाहे स्वयं कितन भी दुखी हों। 
  • दोस्त ही होते हैं जो खुद की जेब खाली रखते हैं लेकिन आपको को काम नहीं आने देते हैं। 
  • दोस्त ही होते हैं जो आपके लिए ज़माने से लड़ जाते  हैं। 
  • दोस्त ही होते हैं जो आपमें लाख कमी होने के वावजूद हमेशा तारीफ ही करते हैं। 
  • दोस्त ही होते हैं जिनका खून का रिश्ता तो नहीं होता लेकिन उससे से भी बढकर होता है। 
 
दोस्त बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है फिर चाहे वो किसी भी रूप में क्यों न हो या किसी भी शक्ल में क्यों न हो। भाग्यशाली हैं वो जिन्हे यह रिश्ता मिला क्योंकि पूछो उनसे जो अकेले हैं जिनका कोई मित्र नहीं है। दोस्ती ही ज़िंदगी का दूसरा नाम है। 
 
तो मेरे प्यारे दोस्तों उम्मीद करता हूँ कि आप लोग भी कभी साथ नही छोड़ेगे मेरा और साथ ही यह उम्मीद करता हूँ कि दोस्ती पर यह छोटा सा लेख पसंद आया होगा। Friendship Day पर यह लेख पसंद आया है तो अपने सोशल अकाउंट पर जरूर शेयर करें। 
 
दोस्तों आप हैं तो हम हैं आपके  हौसला अफजाई से ही हम काम कर  पाते हैं। आप लोग इसी तरह साथ देते रहना। आप लोगों का दिल से शक्रिया अदा करता हूँ इस दोस्ती के लिए। क्या आपका भी कोई सच्चा मित्र है नीचे कमेंट करके जरूर बताना और मेरा यूट्यूब चैनल #myhindimind देखना मत भूलना। Friendship Day की आप सभी को भी बहुत -बहुत शुभकामनायें।   

15 August 1947 स्वतंत्रता दिवस पर निबंध

15 अगस्त, 1947 भारतीय इतिहास का लगभग 200 वर्ष के बाद का सबसे खास और महत्वपूर्ण दिन था, जब हमारे भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया और भारत देश के लिए अपने खून से स्वतंत्रता की कहानी लिखी ,इतिहास लिखा । भारत की स्वतंत्रता इतने आसानी से नहीं थी जितनी की शायद लोगों ने सोच रखी है ,यह अनेक संघर्षों और कठिनाइयँ , दुखों , दर्दनाक और भयावह पीड़ा और शोषण के सहने के बाद , अनेकों बलिदान देने से ,स्वयं का रक्त बहाने से प्राप्त हुई है। 
 
गुलामी से  आज़ादी के बाद सम्पूर्ण भारत में त्योहार उत्सव मनाया गया अपनी आज़ादी का , अपने अस्तित्व को फिर से पाने का त्यौहार मनाया गया जिसे 15 अगस्त दिवस के रूप में जानते हैं और इसी दिन पहली बार हमें आज़ादी मिली उन सब चीजों की जो की हर भारतीय चाहता था। इस ऐतिहासिक पल में अपने  भारत का पहला प्रधानमंत्री चुना गया जिन्होंने इस पल को खास बनाते हुए लाल किले पर पहली बार तिरंगा झंडा फहराया।

15 August 1947 स्वतंत्रता दिवस पर निबंध

प्रस्तावना 

15 अगस्त 1947 एक ऐसी तारीख है जो हमारे भारतीय इतिहास में सुनहरे स्वर्ण अक्षरों से लिखी गई है। इस  दिन जब भारत स्वतंत्र हुआ, तो विदेशी शासक अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। हमें दो सौ वर्षों के बड़े अरसे के बाद  गुलामी से मुक्ति मिली, तो आज़ादी का उत्सव को उतना ही बड़ा भव्य होना पड़ा और यही कारण है कि हम आज भी इसे बहुत ही धूमधाम से ,खुशियों के साथ मनाते हैं।

हमारे भारत के राष्ट्रीय त्योहारों में से एक हमारा स्वतंत्रता दिवस है, यह एक ऐसा दिन है जब भारत को स्वतंत्रता मिली थी । जब  अंग्रेजों ने भारत छोड़ दिया था, तब भारतीय जनता ने अपनी पहली आज़ादी की सॉंस ली ,चारो तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ बिखरीं। और अब हम न तो किसी के शारीरिक रूप से गुलाम थे और न ही मानसिक रूप से। इस दिन से हमें हर क्षेत्र में बोलने, पढ़ने, लिखने और  घूमने की भी आजादी मिली थी। 

स्वतंत्रता दिवस से पहले का भारत

1. अंग्रेजों का भारत पर आक्रमण 
 
विदेशी आक्रमणों से भारत पहले ही से परेशान था ,लेकिन सन 1603 में विदेशी आक्रमण अंग्रेजों का हुआ जिसने समस्त भारत की राजाओं , नबाबों ,बादशाहों की नीद ही उड़ा दी और उनकी रियासतों को हिला कर रखा दिया। अंग्रेजों ने अपनी ईस्ट इंडिया कम्पनी उद्योग करने के लिए भारत में स्थापित की थी ,लेकिन बाद में यह राजनैतिक संस्था में तब्दील हो गयी जो भारत के हर राज्य और वहां के शासकों के शासन में हस्तक्षेप शुरू करने लगे थे। यह विदेशी अब तक के आक्रमणों में सबसे चतुर व नीति  निपुण शासक थे। जिन्होंने अपनी कुशल नीति और बल से इन्होने पुरे भारत को जल्द ही अपने कब्जे में ले लिया और फिर मनमाना अत्याचार ,शोषण  शुरू कर दिया। 
 
2. भारत देश अंग्रेजों का गुलाम बन गया  
 
अंग्रेजों द्वारा  भारत पर कब्जा करने के बाद, हम अपने ही देश में ,अपने ही घर में गुलाम बन गए थे । हर चीज चाहे वो पैसा, खाद्यान्न, जमीन,पेड़ पौधे ,नदी तालाब आदि  सब कुछ हमारा था लेकिन अब हमारा इसमें से किसी पर भी कोई अधिकार नहीं रहा था। अंग्रेज मनमाना कर वसूलते लगे थे और किसानो पर नए नए शोषण अत्याचार करने शुरू किये। विरोध करने पर और अत्याचार करने लगते थे। अर्थार्त कसी में भी विरोध करने की हिम्मत नहीं थी। 
 
अंग्रेजों ने हमें शारीरिक, मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। इस अवधि में कई युद्ध भी हुए, जिनमें से सबसे प्रमुख द्वितीय विश्व युद्ध था, जिसके लिए भारतीय सेना को जबरन थोक में भर्ती किया गया था। भारतीयों का अपने देश में कोई अस्तित्व नहीं था, अंग्रेजों ने भी जलियांवाला बाग जैसा नरसंहार किया और भारतीयों को गुलाम बनाकर छोड़ दिया गया।
 
3. राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की स्थापना होना (December 28, 1885)
 
अंग्रजों के अत्याचार से तंग आकर भारतीय स्वतंत्रता प्रेमी,देशप्रेमी लोगों ने और साथ में जनता ने अपना विरोध शुरू कर दिया था जिसमें सबसे महत्वपूर्ण और आज़ादी की पहली कड़ी थी सन 1857 का विरोध जो एक स्वतंत्रता संग्राम में बदला और  जिसमें मुख्य महान क्रांतिकारी “झाँसी की रानी” अकेली मर्दानी थी खूब लड़ी और अंग्रेजों के अकेले ही दाँत खट्टे कर दिये। 
 
लेकिंन इस विरोध में बहुत से भारतीय सत्ता लोलुप लालची लोग अंग्रेजी के साथ थे जिन्होने मिलकर इस संग्राम  में अंग्रेजों की जीत करवा दी। यही गद्दारी देश के भविष्य के लिए बहुत ही भरी पड़ी वरना तो देश 1857 की इस बड़ी और पहली क्रांति में आज़ाद ही चूका होता। 
 
इसके बाद भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के लोगों में यह बात अच्छे से समझ आ गयी की बिना एकजुट हुए इन अंग्रेजों से जितना संभव नहीं और इसके लिए एक राजनैतिक पार्टी भी होना आवश्यक है। अंततः  इस संघर्ष के वातावरण के बीच, 28 दिसंबर 1885 को, पहली राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की स्थापना 64 व्यक्तियों द्वारा की गई , जिसमें अध्यक्ष दादा भाई नौरोजी और ए ओ ह्यूम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उसके बाद इसी पार्टी के तले  धीरे-धीरे क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम जाना लगा , जिसमें महात्मा गाँधी के सारे आंदोलन भी महत्वूर्ण माने जाते हैं। 
 
4 . स्वतंत्रता सेनानीयों का योगदन
 
स्वतंत्रता संग्राम में सैकड़ों नाम हैं जैसे सुभाष चंद्र बोस, बाल गंगाधर तिलक, मंगल पांडे, रानी लक्ष्मीबाई, गणेश शंकर विद्यार्थी, वीर सावरकर ,राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद आदि जिनके योगदान अतुलनीय हैं।
 
भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के नाम गिनना वास्तव में एक कठिन कार्य ही है इसमें अनेक भारतीय सपूतों ने अपनी आहुति दी हैं जिसमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस जिनका प्रसिद्ध नारा था “तुम मुझे खून दो ,में तुम्हें आज़ादी दूंगा ” ने ,बाल गंगा धर तिलक ,महात्मा गांधीजी,सरदार वल्लभ भाई पटेल आदि स्वतंत्रता सेनानियों से पहले नाम आता है ,चंद्रशेखर आज़ाद , भगतसिंह ,राजगुरु , सुखदेव आदि ऐसे नाम हैं जिहोंने हँसते हसते अपनी जान देश के लिए कुर्बान कर दी और इन सपूतों के कारन ही उस समय की अंग्रज सरकार को झुकना पड़ा और मज़बूर होकर महात्मा गाँधी जैसे नेता जिन्हे “अहिंसा के पुजारी ” कहते हैं की शरण जाना पड़ा था। 
 
उस समय के गाँधी जी ऐसे नेता थे जो हिंसा में विस्वास नहीं रखते वह सिर्फ प्रेम और अहिंसा में ही विस्वास रखते थे इसी कारन से उन्हें लोग महात्मा या संत कहकर पुकारते थे। लेकिन कांग्रेस पार्टी में गाँधी जी के साथ कई ऐसे लोग थे जो बिना हिंसा के युद्ध करना संभव नहीं समझते थे। इसलिए यह पार्टी दो भागों में बट गयी थी एक नरम दल और दूसरा गरम दल। 
 
 गाँधी जी द्वारा किये आंदोलनों से भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को बहुत बल मिला और जालियांवाला हत्या कांड के बाद तो गाँधी जी द्वारा अंग्रेजों का घोर विरोध और बहिष्कार शुरू हुआ। लेकिन गोरखपुर पुलिस चौकी हत्या कांड से गाँधी जी नाराज थे। लेकिन 1932 “सविनय अवज्ञा आंदोलन” फिर शुरू किया। उसके बाद लाला लाजपतराय जैसे आदि सेनानी के मौत के बाद “अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन ” गाँधी  जी द्वारा शुरू हुआ जो बाद में स्वतंत्रता आंदोलन में बदल गया और अंततः अंग्रेजों को झुकना ही पड़ा। 
 
और आख़िरकार सन 1947 में 15 अगस्त को अंग्रेजों ने भारत को भारत के सुपुर्द कर दिया और यह देश छोड़कर चले गए। और भारत देश गुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद हुआ। खुशियां मनायीं गयीं उत्सव मनाया गया। भारत की अपनी सरकार बनी। संविधान व कानून बना। देश फिर से एक अखंड भारत बना लेकिन यह इतना आसान नहीं था। इसके लिए सरदार वल्ल्भ भाई पटेल ने एक लोह पुरुष की भूमिका निभाई और सभी छोटी बड़ी रियासतों को भारत में शामिल किया गया, इस  तरह यह नया आज़ाद भारत देश बना। 
 

स्वतंत्र भारत 15 अगस्त 1947

भारत स्वतंत्र हुआ खुशियाँ थी इस दिन, लेकिन इस देश का प्रधामंत्री कौन बने यह मुश्किल सामने आ पड़ी।  आख़िरकार देश के बटबारे का निर्णय लिया गया और इस दिन ही देश को दो हिस्से में बाँट दिया गया जिसमें एक हिंदुस्तान ,दूसरा भाग पाकिस्तान कहलाया। पाकिस्तान मुस्लिम समुदाय के लिए और हिंदुस्तान हिन्दू लोगों के लिए। लेकिन इस बटवारे में मुस्लिम और हिन्दुओं के बीच हिंसात्मक संघर्ष हुए और लाखों लोगों की फिर जानें गयीं।
 
उसके बाद गाँधी जी के बयान पर की जिसको नहीं जाना है अपनी जगह छोड़कर वो मज़बूर नहीं है तब जाकर यह खुनी संघर्ष रुका और फिर लोगों का पलायन रुका और जो जहां था वहीं रुक गया। 
 
14 अगस्त को पाकिस्तान का और 15 अगस्त को भारत का स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया।आजादी एवं बटवारे के बाद हम हर वर्ष, स्वतंत्रता दिवस को अपने अमर वीर ज़वानों एवं दंगे में मारे गए निर्दोष लोगों की याद में यह त्यौहार मानते हैं ,मेले लगते हैं,लेकिन सबकी आँखों में आंसू होते हैं।अमर ज़वानों की यह गाथा सदैव इतिहास में गायी जाती रहेगी। हर साल उनकी याद में मेले लगेंगे और उनकी वीरता और साहस के गुण गा -गा कर श्रद्धांजलि देते रहेंगे। 
 

आज के दौर में भारतीय स्वतंत्रता दिवस

आज के दौर में स्वतंत्र भारत में इस पर्व को मनाने के तरीके अलग-अलग हैं। 15 अगस्त दिवस के हफ्ते भर पहले से ही बाजारों मे रौनक आ जाती है, कहीं तीन रंगों की रंगोली बिकती है, तो कहीं तीन रंगों की लाइटें,लोग तीन रंगो के खेल खिलोने भी लेते हैं ,अपने चेहरे पर तिरंगे का टेटू भी लगवाते हैं । पूरा समा ही मानो इन तिरंगे के तीन रंगों मे घुल जाता है। चारों तरफ खुशी का माहौल होता है,कहीं देशभक्ती गीतों की झनकार होती है । पूरा देश नाचते-गाते इस उत्सव को हर्सोल्लास के साथ मनाता है। लोग स्वयं भी झूमते हैं और दूसरों को भी थिरकने पर मजबूर कर देते हैं। पूरा देश ऐसे एकजुट हो जाता है वो भी ऐसे, कि क्या हिंदू क्या मुसलमान, कोइ भेद ही नज़र नहीं आता।

निष्कर्ष

यह 15 अगस्त का त्योहार हमें इतिहास के साथ-साथ अमर नायकों के बलिदानों  को नहीं भूलने की याद दिलाता है, ताकि फिर किसी को व्यापार के बहाने शासन करने और युवा पीढ़ी को उनके गौरवशाली इतिहास से परिचित कराने का मौका न मिले। सभी लोग इस दिन देश के लिए एक साथ आते  हैं, मेले जाते हैं ,परेड की शोभा देखते हैं ,स्वादिष्ट व्यंजन खाते हैं और सभी को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देते हैं।

श्री गणेश चतुर्थी का महत्व ,पूजा विधि और कहानी

यदि आप एक भारतीय हैं तो आपको गणेश चतुर्थी त्यौहार की पूजा विधि और गणेश चतुर्थी का महत्व साथ ही उसके पीछे की सच्ची कहानी क्या है ?यह जानना बहुत ही जरुरी है। गणेश चतुर्थी  भारत  के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक माना जाता है। यह हर साल हिन्दुओं द्वारा बहुत ख़ुशी , भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह त्यौहार भारत में विनायक चतुर्थी के रूप में भी लोकप्रिय है। 

यह त्यौहार भारत में प्राचीन काल से ही हिंदुओं के प्रथम देवता, भगवान गणेश (जिन्हें हाथी के नेतृत्व वाले, विनायक, विघ्नहर्ता, बुद्धि के देवता और रिद्धि सिद्धि  के देवता) के रूप में जाना जाता है। श्री गणेश जी की पूजा करने से लोगों को मनचाही वस्तु जैसे – धन ,वैभव ,सुख ,सम्पति ,विद्या ,शक्ति आदि मिलती हैं। 

हिंदू पंचांग  के अनुसार, यह हर साल भादों  (अगस्त और सितंबर के बीच) के महीने में ही पड़ता है। यह शुक्ल पक्ष की चतुर्थी  से प्रारम्भ होता है और अनंत चतुर्दशी तक 10 दिनों  तक बड़ी धूम- धाम के साथ समाप्त होता है।

श्री गणेश चतुर्थी त्यौहार भगवान गणेश के जन्म के दिन मनाया जाता है। गणेश भगवान् को ज्ञान का देवता, विद्या -बुद्धी का देवता, समृद्धि,ऐश्वर्य का देवता और सौभाग्य का देवता भी कहा जाता है, भगवान् की पूजा करने से घर में सुख, शांति और वैभव आता है और दुखों का ,कष्टों का अंत होता है ।

आजकल लोग भगवान गणेश की मिट्टी की छोटी बड़ी व विशाल मूर्तियों को घर या सार्वजनिक पंडालों में लाते हैं और दस दिनों तक पूजा -अर्चना ,ध्यान , भजन कीर्तन आदि करते हैं। इस त्योहार के अंत में, लोग इन् मूर्तियों को पानी के छोटे बड़े  स्रोतों (समुद्र, नदी, झील, आदि) में विसर्जित किया करते हैं।यह त्यौहार भारत के अलावा कई तराई क्षेत्रों में जैसे -नेपाल, बर्मा, थाईलैंड, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, गुयाना, मारीशस, फिजी, सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया, कंबोडिया, न्यूजीलैंड, त्रिनिदाद और टोबैगो आदि देशों में भी खूब धूम धाम और भक्ति के साथ मनाया जाता है। 

भगवान् गणेश जी की पूजा करने से गणेश जी प्रसन्न होते हैं और  लोगों के जीवन से सभी बाधाओं और मुश्किलों को हर लेते हैं  साथ ही साथ उनके जीवन को खुशियों से भर देते है। हिन्दू धर्म में सबसे पहले भगवान श्री गणेश का ही पूजन किया जाता है प्रत्येक त्यौहार , उत्सव , पूजन आदि में। तो चलिए जानते है गणेश चतुर्थी का महत्व व पूजा विधि  हिंदी में:

गणेश चतुर्थी की पूजा विधि क्या है ?

हिंदू शास्त्रों के अनुसार, किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले श्री गणेश की पूजा करना आवश्यक है। जहां भी गणेश की पूजा अर्चना की जाती है, वहां पर ऋद्धि-सिद्धि और शुभ लाभ का वास रहता है। जिस भी घर में श्री गणेश भगवान्  की पूजा की जाती है, तो सबसे पहले उस घर में गणेश की मूर्ति स्थापित की जाती है और  पूरे घर को फूलों से,रंग – बिंरगे  लाइट्स झालरों आदि से सजाया जाता है।
 
वास्तु विज्ञान भी कहता है कि माँ पार्वती के लाल की जिस घर में भगवान गणेश की मूर्ति या तस्वीर होती है, उस घर में रहने वाले लोग प्रगति करते हैं,सुख शांति से रहते हैं।भगवान् गणेश की चतुर्थी के दिन लोग व्रत उपवास रखते हैं और बिधि विधान से पूजा करते हैं , तो आइये जानते हैं गणेश चतुर्थी व्रत विधि।

श्री गणेश पूजन में प्रयुक्त सामग्री

श्री गणेश जी को स्थापित करने के लिए एक चौकी, चौकी पर  बिछाने के लिए एक लाल कपड़ा, जल कलश, पंचामृत, चंदन, गंगाजल, सिंदूर, लाल पुष्प और एक फूल माला, इत्र, मोदक या लड्डू (घर पर बनाये हों तो बेहतर है ), गुड और धान, सुपारी, नारियल, फल, पंचमेवा, घी दीपक, धुप, अगरबत्ती, कपूर आदि।
 
पूजा करने से पहले यह सारी सामग्री इक्कठी करें। यदि मिटटी की मूर्ति है तो उसे पवित्र  कपडे से साफ करें या फिर चांदी या पीतल आदि की है तो गणेश जी  को शुद्ध पानी से पहले नहलाये और सूंदर सूंदर कपड़े पहनाएं ,चन्दन ,सुंगंधित चींजें लगाएं,धुप बत्ती जलाएं ,फूलों से सजाएँ ,पूजा  शुरू करने से पहले ही दीपक प्रज्वलित कर लेना चाहिए। 
 
सजावट शृंगार आदि के बाद शुद्ध भाव से बने हुए पकवान व मिष्टान आदि का भोग अर्पण करना चाहिए तथा उसेक बाद सब मिलकर प्रभु गणेश जी स्तुति ,पाठ आदि के बाद आरती करनी  चाहिए ।  
 
यदि पूरी  श्रद्धा और भक्ति के साथ साफ़ मन से गणेश भगवान जी का भजन और गणेश मंत्र पढते हैं तो  मिटटी से बने मूर्ति में भी गणेश जी का वास हो जाता है। ये भी माना जाता है की इस तरह पूजा के दौरान गणेश जी भक्तों के घर प्रवेश में करते हैं और उनके घरों में शांति ,सुख, समृद्धि ,वैभव ,अच्छा भाग्य से खुशियाँ भर देते हैं। 
 
और हाँ सबसे खास बात यह कि गणेश जी की पूजा में मोदक का भोग अवश्य  लगाना चाहिए  क्योंकि गणेश जी को मोदक सबसे अधिक प्रिय हैं , मोदक घर के बने हों तो सोने पे सुहागा है नहीं तो बाज़ार में भी उपलब्ध होते हैं ,इससे भगवान गणेश जी बहुत ही  प्रसन्न होते हैं। 

श्री गणेश चतुर्थी का महत्व

श्री गणेश चतुर्थी का बिशेष महत्व होता है ,इस दिन जो भी मनुष्य प्रभु गणेश जी की सच्चे मन से आराधना करता है ,उनका ध्यान ,पूजा पाठ करता है तथा साथ ही व्रत रखता है और विधि विधान , भजन कीर्तन से पूजन शरू और समाप्त करता है,तो मनुष्य का कल्याण होता है और उनकी सभी मनोकामनाएं भी पूरी हो जाती है। भगवान गणेश उस पर प्रसन्न होकर उसके जीवन से सभी दुखों और परेशानियों को दूर कर देते हैं और उन्हें बुद्धि, कौशल, प्रतिभा, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। 

श्री गणेश जी के जन्म व गणेश चतुर्थी की कहानी

श्री गणेश चतुर्थी भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक मना जाता है। भारत के लोग पूरे साल इस त्योहार का बड़ी ही बेसब्री से इंतजार करते हैं। वैसे तो यह त्यौहार पूरे देश में बड़े ही हर्सोल्लास के साथ मनाया जाता है। लेकिन भारत के महाराष्ट्र राज्य में इस त्यौहार को सबसे अधिक उत्साह,भक्ति  के साथ मनाया जाता है। 
 
महाराष्ट्र  में इसे बड़े ही उत्साह  और धूम -धाम से मनाया जाता है।  क्योंकि गणेश चतुर्थी को मनाने की शुरुआत ही महाराष्ट्र के मराठा राज्य काल के राजा छत्रपति शिवाजी ने की थी और तबसे ले कर आज तक इसे प्रेम ,भक्ति के साथ मनाया जाता है। तथा इसका सबसे अधिक प्रचार प्रसार बाल गंगाधर तिलक ने स्वतंत्रता के समय किया था। उस समय से ही यह समस्त भारत का एक प्रिय और अंग्रणी त्यौहार बन गया था। गणेश उत्सव सौहार्द व प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है जिसकी शुरुआत श्री बाल गंगाधर तिलक ने की थी। 
 
गणेश महोत्सव का आनंद में डूबने के लिए महारास्ट्र सरकार सभी विद्यालयों, कॉलेजों और कार्यालयों में पुरे दस दिन के लिए श्री गणेश चतुर्थी का अवकाश घोषित करती है। 
 
श्री गणेश जी सबसे प्रथम पूज्य भगवान के नाम से पूजे जाते हैं।  गणेश जी उन्नति, खुशाली और दुःख हरने वाले मंगलकारी के देवता हैं।  किसी भी शुभ मुहुर्त ,कार्य,उत्सव आदि  को पूरा करने से पहले श्री गणेश जी की पूजा सबसे पहले अवश्य ही की जाती है। 
 
श्री गणेश जी के जन्म या गणेश चतुर्थी के पीछे एक पौराणिक कथा विद्यमान है। आइये जानते हैं भगवान् श्री गणेश जी का जन्म कैसे हुआ और कैसे वो प्रथम पूज्य भगवान् बने :
 
भगवान् श्री गणेश जी के जन्म की कथा इस प्रकार से है – एक समय की बात है कैलास पर्वत पर निवास करने वाले भगवान् महादेव कहीं अन्यत्र गए हुए थे,उस दिन माता पार्वती स्नान ध्यान करने के लिए अंदर गयी तो उस समय घर के बहार पहरा देने के लिए माता पार्वती ने नन्द जी को बैठा दिया  और उनसे कहा कि – मेरी इजाजत के बिना किसी को भी अंदर नहीं आने देना है। 
 
उसके पश्चात् माता स्नान करने चली गयी।थोड़ी देर बाद महादेव शिव जी आये, नन्द जी ने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन महादेव जी ने नन्द जी की  बातों को अनदेखा किया और अन्दर चले गए। यह बात जब माँ पार्वती जी को पता चली तो पहले तो उन्हें बहुत ही क्रोध आया। फिर उन्होंने सोचा यदि कोई मेरा पुत्र होता तो वो महादेव जी को अंदर प्रविष्ट नहीं करने देता। 
 
तब माता पार्वती जी ने मन ही मन निर्णय लिया की उन्हें एक पुत्र जैसा ही द्वारपाल चाहिए जो केवल उनकी ही आज्ञा का पालन करे फिर चाहे केसी भी परिस्थिति क्यों न हो। इसी सोच के अनुसार माँ  पार्वती जी ने चन्दन के लेप को  लगाकर उससे निकले मैल से उन्होंने  एक बालक का स्वरुप दिया  और उसे अपनी शक्ति से प्राण भर के उसे बहुत सा आशीर्वाद व शक्ति देकर समझाया कि – “वत्स जब तक आपकी माँ अंदर से स्नान ध्यान करके नहीं आती तब तक आप यहाँ पर  पहरेदारी करंगे और किसी भी को अंदर नहीं आने देंगे चाहे कुछ भी हो ,ठीक है”। 
 
यह समझाकर माँ पारवती अंदर चली गयीं और वह बालक द्वारपाल की तरह दरवाजे पर जा डटा और संकल्प लिया कि माँ चाहे प्राण ही क्यों न चले जायँ लेकिन में किसी को भी अंदर नहीं आने दूंगा । 
 
ठीक उसी  समय महादेव जी का आगमन हुआ ,उन्होने उस बालक पर ध्यान न देते हुए जैसे ही दरवाजे का रुख किया तो उस बालक ने बड़ी निरभीकता के साथ उन्हें अंदर जाने से रोका। 
 
जब महादेव शिव जी ने देखा की एक सूंदर सा अद्भुत बालक मुझे अंदर जाने से रोक रहा है तो उन्होंने मुस्करा कर पूछा कि -वत्स आप कौन हैं जो इस समय मेरे घर के बाहर खड़े होकर मुझे रोकने का दुःसाहस कर रहे हो। 
तब उस बालक ने बिना डरे हुए महादेव जी को उत्तर दिया कि मैं  माँ पार्वती का पुत्र हूँ और उन्हीने मुझे आज्ञा दी है कि कोई भी अभी अंदर नहीं जा सकता है। 
 
भोलेनाथ जी सोच में पड़ गए , फिर उन्होंने उस बालक को समझाया कि – में इस घर मालिक और पार्वती का पति महादेव हूँ अतः हे बालक ! हठ मत करो मुझे अंदर जाने दो। लेकिन उस बालक ने भगवान् का निरादर करते हुए कहा कि चाहे प्राण ही क्यों न चले जाएँ परन्तु आप अंदर नहीं जा सकते। तब महादेव जी के गणों ने उस बालक से घोर युद्ध किया परन्तु वह उसके सामने बिलकुल नहीं ठहरे और हारकर महादेव जी की और देखने लगे। 
 
तब  उस बालक की इस अपमान जनक कृत्य ने  महादेव जी के अंदर क्रोध भर दिया और उन्होंने अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया। जैसे ही यह बात माँ पार्वती जी को मालूम हुई तो वह रोती हुई अपने बालक को उठाकर क्रोध में भरकर बोलीं यदि मेरे इस बालक को अभी जीवित नहीं किया गया तो में इस पूरी सृष्टि का संहार कर दूंगी। 
 
माँ पार्वती का यह क्रोध देखकर सभी देवता व्याकुल हो गए और महादेव जी के शरण गए और उनसे माँ पार्वती को शांत करने की प्रार्थना की। महादेव जी ने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन पार्वती जी नहीं मानी और शिव जी से कहने लगी- “आप तो देवों के देव भगवान् महादेव जी हैं आप किसी भी प्रकार से मेरे पुत्र को फिर से जीवित करिए वरना मै भी यहीं  रो रो कर अपनी जान दे दूंगी” 
 
तब महादेव जी ने अपने गण नन्द जी से कहा कि उत्तर दिशा को जाओ और जो भी पहले नवजात बालक मिले जिसकी माँ उसकी तरफ पीठ करके सो रही हो उसका सर ले आओ। 
 
नन्द जी ने देखा एक हथनी अपने नवजात बच्चे की ओर पीठ करके सो रही है उन्होंने उस बालक का सर ले लिया और महादेव जी को दिया।महादेव शिव जी ने उस सिर को बालक के धड़ से जोड़ दिया तो वह बालक पुनर्जीवित हो गया और उस गजमुख बालक को अपने ह्रदय से लगा लिया और माँ पार्वती का क्रोध भी शांत हुआ। 
 
इस प्रकार से महादेव जी ने उसका नाम रखा गणेश। उसके अलावा सभी देवताओंने अपने अपने आशीर्वाद दिया। वरदान दिया जो भी तुम्हारे इस रूप की पूजा अर्चना करेगा उसकी सभी मनो कामनाएं पूरी होंगी उसके सारे दुःख दूर होंगे और किसी भी कार्य में विध्न नहीं होगा। 
 
ऐसा माना जाता है कि जिस दिन श्री गणेश जी जन्म हुआ था उस दिन भादों के महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी थी ,इसलिए इस दिन को भगवान श्री गणेश जी के जन्म दिन को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। 

श्री गणेश चतुर्थी महोत्सव 2020 इस वर्ष कब है ?

भाद्रमास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को समस्त भारत में श्री गणेश चतुर्थी का आयोजन किया जाता है एक महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। जबकि एक महीने पहले से ही , सभी बच्चे अपने बड़ों से पूछना शुरू करते हैं कि गणेश चतुर्थी इस बार कब है या गणेश चतुर्थी किस तारीख को पड़ने वाली है? तो इन सब बातों को सुनकर हम सबके दिमाग में भी यही सवाल आता है कि 2020 में गणेश चतुर्थी कब है?
 
इस वर्ष श्री गणेश चतुर्थी 22 अगस्त 2020 दिन  शनिवार को मनाई जाएगी। गणेश चतुर्थी के दिन , लोग अपने घरों में गणेश भगवान् की मूर्ति की  स्थापना करके गणेश जी की पूजा करते हैं। इस त्यौहार का  उत्सव गणेश चतुर्थी के दिन से शुरू होता है और 10 वें दिन यानि अनंत चतुर्दशी को गणेश जी की मूर्तियों के विसर्जन के साथ संपन्न किया जाता है।
 
10 दिनों तक चलने वाले इस त्यौहार की शुरुआत भक्तों  द्वारा सुबह उठकर स्नान ध्यान करने से की जाती  है। वे हर्ष के साथ इस त्योहार के लिए नए नए  कपड़े खरीदते हैं बाज़ार से उसके बाद साफ कपड़े पहनते हैं। वे मंत्रों और भजनों के पारंपरिक अनुष्ठानों द्वारा गणेश जी की पूजा अर्चना करते हैं उन्हें प्रसन्न करते हैं ।
 
इस दिन, सभी घरों और मंदिरों में पूजा की जाती है जहाँ पर गणेश जी भगवांन के भजन ,कीर्तन बड़े ही प्रेम से गाए जाते हैं, गणेश चतुर्थी का व्रत भी भक्त लोग रखते है। मंदिरों में भक्तों की बराबर भीड़ लगी होती है जहाँ पर लोग गणेश के आशीर्वाद के लिए जाते हैं।
 
गली और मोहल्लो में पूजा का आयोजन किया जाता है और जगह जगह छोटे बड़े पंडाल बनाए जाते हैं जिसमें गणेश जी की विशाल मूर्ति स्थापित की जाती हैं । इस दिन, बूढ़े ,बच्चे सभी उत्साह और ख़ुशी से भरे होते हैं और गणेश की पूजा में बच्चे अपने माता-पिता के साथ जाकर गणेश भगवान के सामने प्रार्थना करते हैं,उनका आशीर्वाद लेते हैं ।
 
गणेश चतुर्थी का यह त्यौहार दस दिनों तक खूब उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है और अंतिम दिन गणेश जी की मूर्ति को चल समारोह के साथ नदी आदि में विसर्जित किया जाता है। यह चल समारोह बहुत ही विशाल होते हैं और यह एक भव्य आयोजन के रूप में प्रस्तुत होते हैं जहां संगीत तथा विभिन्न प्रकार के गाजे बाजे , ढोल आदि पर भक्त लोग जयकारे लगाते हुए   “गणपति बप्पा मौर्या!! मंगल मूर्ति मौर्या!! अगले वर्ष तू जल्दी आ !!”  , नाचते हुए गणेश जी को विसर्जन करने जाते हैं। 
 
विसर्जन करने के बाद भक्तजन दुःखी होते हैं और अगला वर्ष जल्दी आने की कामना करते हुए अपने अपने घर को जाते हैं। भगवान श्री गणेश के सभी भक्त जाति और रंग आदि के अंतर के भुला कर एक साथ उत्सव मनाते हैं।इस प्रकार से श्री गणेश चतुर्थी का त्यौहार खुशी ,उमंग ,उत्साह देता है  और साथ ही सभी लोगों में सौहार्द की भावना को बढ़ाता है। 
 

गणेश चतुर्थी की कविता

गणपति हैं हम सबके प्यारे, 
गौरीशंकर जी के राजदुलारे 
हैं जिनकी सवारी मूषक ,
सबको हैं लगते प्यारे प्यारे 
प्यारी सी भोली सी सुन्दर मूरत, 
देखना चाहती है आँखे हर पल जिसकी सूरत 
मोदक प्रिय लम्बा है जिसका उदर, 
अपने भक्तो की करते हैं फिकर 
सब देवो में देव हैं अपने गणेश ,
सबसे पहले पूजा होती है कहते हैं “जय श्री गणेश “
रिद्धि सिद्धि के देने वाले, 
बिगड़े हुए भाग्यों को बनाने वाले हैं 
हरते हैं सब विध्न उनके ,
जो भक्ति से भजन करते हैं गणेश के 
इस गणेश चतुर्थी को मिटटी की मूरत लाना ,
अपने घर को हर दुःखों ,कष्टों से है बचाना 
जिस घर पधारते हैं श्री गणेश ,
मिट जाते हैं सारे दुःख और क्लेश
मंगल मंगल ही करते हैं मोदक प्रिय गणेश ,
होंगे सारे काज शुभ यदि करने से पहले बोलोगे “जय श्री गणेश ” 
“जय श्री गणेश ” “जय श्री गणेश ”  
 
मुझे उम्मीद है कि आपको गणेश चतुर्थी कहानी व  “गणेश चतुर्थी पूजा विधि और गणेश चतुर्थी का महत्व” के बारे में  यह लेख काफी पसंद आया होगा। अपने छोटे और बड़े, सभी बच्चे भी भगवान् गणेश जी से बहुत ही प्यार करते हैं। तो आशा करते हैं कि इस वर्ष आप भी अपने घर में पुरे उत्साह और उल्लास के साथ गणेशजी को लायेंगे और उनकी भक्ति भाव से पूजा अर्चना ,सेवा करके अपनी सभी मनोकामनाएं पाएंगे। इस महामारी के काल में शायद बड़े बड़े महोत्सव जैसे मुम्बई के लालबाग के राजा नहीं विराज पायंगे तो हमें सुरक्षा का ख्याल जरूर रखना है और भगवान् श्री गणेश जी प्रार्थना करना है कि यह महामारी जल्द से जल्द इस संसार से जाये और लोग पहले की तरह फिर से हंस खेल पाएं उत्सव आदि मना पाएं। 
 
इसके साथ ही अपने आसपास और स्वयं की भी साफ-सफाई का ध्यान अवश्य रखेंगे, इस कोरोना महामारी के काल में।  यह संकल्प जरूर लें कि इस वर्ष हम सब मिलकर पर्यावरण के अनुकूल ही गणेश चतुर्थी का त्योहार मनाएंगे।साथ ही अन्य लोगों को भी यह सन्देश देंगे की मिटटी की ही गणेश जी की मूर्तियां लायेंगे और हो सके तो अपने घर में ही उनका विसर्जन करेंगे। 

कृष्ण जन्माष्टमी पर छोटे-बडें- निबंध Essay

कृष्ण जन्माष्टमी पर छोटे-बडें निबंध 

(Short and Long Essay on Krishna Janmashtami in Hindi)

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर निबंध :

भारतीय वेद व  पुराणों के अनुसार सतयुग,द्वापर ,त्रेता और कलियुग इन चार युगों में समयकाल विभाजित किया गया है।जब-जब पृथ्वी पर दुष्टों एवं राक्षसों का प्रकोप बढ़ जाता है,धर्म का नाश होने लगता है,दुष्ट राजा लोग जनता को सताते हैं। अधरम बढ़ने लगता है तब तब हर युग में  भगवन दुष्टों,राक्षसों  का वध करने एवं धर्म को स्थापित करने के लिए ,सज्जन पुरुष ,साधु लोगों की पीड़ा हरने के लिए मनुष्य आदि के रूप में पृथ्वी पर अवतार लेते हैं। 

हमारे पुराणों के अनुसार जब द्वापर युग के अंत में पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ गया लोग अधर्मी और अभिमानी हो गए तथा दुष्ट राक्षस लोग मनुष्य के रूप में राजा बन कर पृथ्वी पर राज करके चारों ओर अत्याचार करने लगे। प्रजा और साधु संत लोग कहीं भी सुख से नहीं रह पा रही थी। हर जगह अत्याचार और अधर्म ही हो रहा था। लोग स्वयं को ही भगवन समझने लगे थे। 

मथुरा का राजा था कंस जो बहुत शक्तिशाली और दुष्ट था। वह नित्य अपनी प्रजा को कष्ट देता उन्हें दुखी रखता था।उसका अभिमान इतना बढ़ गया था कि वह देवताओं तक को कष्ट पहुँचाता था। चारों दिशाओं में उसके ही  गूंज थी। यदि कोई भी उसके खिलाफ बोलता तो वह उसे मृत्यदंड दे देता था।  

द्वापर युग के अंत में भगवान विष्णु ने भाद्रपद माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि में मथुरा नगर के राजा कंस के कारागृह में श्री कृष्ण के रूप में जन्म लिया।अतः हर वर्ष भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष को जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। 

श्री कृष्ण के जन्म दिवस के रूप में हर वर्ष भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष को कृष्ण जन्माष्टमी हर्षोल्लास के साथ पुरे भारत में मनाया जाता है। यह त्योहार हिंदु धर्म की अखंड परंपरा को दर्शाता है व सनातन धर्म का बहुत बड़ा पवित्र ,श्रद्धा ,भक्ति प्रेम का त्योहार है। यही नहीं यह त्यौहार  भारत से दूर अन्य देशों में बसे भारतीय भी इस त्योहार को धूम-धाम से ख़ुशी से मनाते हैं।

श्री कृष्ण का जन्म उत्तरप्रदेश की मथुरा पावन नगरी में हुआ था। श्री कृष्ण जी का आकाश के समान नीला रूप भगवान की असीम क्षमता और शक्ति को दर्शाता है। उनके तन का पीला वस्त्र धरती के रंग रूप का वर्णन प्रकट करता है।  एक शुद्ध, अनंत शक्ति चेतना का रूप लेकर कृष्ण जी का पृथ्वी पर जन्म हुआ था जिन्होंने बुराईयों का अंत किया और अच्छाई को पुनर्जीवित किया तथा धर्म को स्थापित किया। 

कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हर कोई भगवान के दर्शन करने के लिए बधाई देने के लिए उनकी जन्म भूमि मथुरा में आता है। दूर दूर से भक्तजन बाल रूप भगवांन श्री कृष्ण के दर्शन करने आते हैं और अपने मंगलमय जीवन की कामना करते हैं। हमें अपने बच्चों को जन्माष्टमी और कृष्णा की महिमा की कहानी बताकर उन्हें इस पवित्र पर्व का महत्व अवश्य ही  बताना चाहिए।

अतः आपके इस कार्य में हेल्प करने के लिए मैंने यहाँ कृष्ण जन्माष्टमी का निबंध हिंदी में प्रस्तुत किया है, इसे आप अपने बच्चों के साथ जरूर बाँट सकते हैं` और ये आपके बच्चों के स्कूल के कार्य में भी काफी हेल्प करने वाला साबित होगा। 

जन्माष्टमी पर निबंध हिंदी में (Essay on Janmastami in Hindi)

श्री कृष्ण जी जिन्हें हम प्रेम से गोविंद, बालगोपाल, कान्हा, लड्डू गोपाल, माखन चोर और अन्य  सहस्त्र नामों  से भी पुकारते हैं। वेद पुराणों के अनुसार श्री कृष्ण का जन्म आज से लगभग 5 हजार साल पहले मथुरा नगरी के कंस राजा की कारागार में हुआ था। श्री कृष्ण जी देवकी और वासुदेव के आठवीं संतान थे। लेकिन उनका पालन पोषण यशोदा मैया और नन्द जी के द्वारा गोकुल में हुआ था। 

श्री कृष्ण जी भगवन विष्णु के अवतार माने जाते हैं। द्वापर के अंत में भगवान ने पृथ्वी पर हो रहे अत्याचार , दुष्टों , राक्षसों का , बुराइयों का अंत करने तथा धर्म की  स्थापना करने के लिए , अपनी शक्ति और अद्भुत आश्चर्यजनक सौंदर्य के साथ  श्री कृष्ण के रूप में अवतार लिया था। 

भगवान श्री कृष्ण का अवतार हुआ था से आशय है कि भगवान का जन्म मनुष्यों या अन्य जीवों की तरह नही होता है वह प्रकट होते हैं अपने स्वरुप  के साथ। भगवांन का जन्म किसी न किसी खास उद्देश्य के पूर्ण करने लिए होता है। भगवान हमेशा अपने भक्तों ,प्रेमी की प्रार्थना से ही ,उनके प्यार की करूण पुकार से ही प्रकट हुआ करते हैं। 

भारत शुरू से ही देवी देवताओं की भूमि मानी जाती है जहाँ विभिन्न प्रकार से देवी देवताओं की पूजा अर्चना की जाती है।  दुनिया में सबसे ज्यादा त्यौहार भारत में ही मनाये जाते  हैं  और हर त्यौहार के पीछे देवी देवताओं की  कोई ना कोई पौराणिक कथाएँ  भी जुडी होती हैं। जो मनुष्यों को सही ज्ञान और मानवता का धर्म सिखाती हैं। 

यह कथाएं  हर वेद , पुराण में पाये जाते हैं जो गुरु, शिक्षक और माता पिता द्वारा हम तक पहुँचते हैं। भगवन श्री कृष्ण से जुडी त्रिलोक पावनि कथा है जिसे सुनकर,भगवान कृष्ण के कार्यों को याद करके प्रेमी  प्रेम में डूब जाता है भक्ति में खो जाता है। भगवान की कथा  लोगों का कल्याण,विश्व का कल्याण  करने वाली होती है। मानव को उन्हें सच्चे मार्ग पर ले जाने वाली होती है ,परस्पर प्रेम व स्नेह  के साथ रहना सिखाती है ,अज्ञानता को दूर करती है सुख पहुंचाती हैं।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की कथा :

मथुरा नगरी का एक राजा था जिसका नाम था कंस। कंस राजा बड़ा ही दुष्ट और राक्षस प्रकृति का था। वह सदा लोगों पर अत्याचार किया करता था। उसके राज्य की प्रजा व किसान बहुत ही दुखी से उसके शासन की नीतियों से। सभी जगह अधर्म ही हुआ करता था। लोगों को व्यर्थ ही परेशान किया जाता उन्हें कष्ट दिया जाता। किसानों से अधिक और मनमाना कर लिया जाता था।

राजा कंस के राज्य में मनुष्य तो छोड़ो देवी देवता भी उसके करतूतों से बहुत ही दुखी थे क्योंकि कंस अत्यंत शक्तिशाली राजा था जिससे किसी का भी जीतना  नामुमकिन था। राजा कंस के दरवार में उसी की तरह अन्य मंत्री और सैनिक भी दुष्ट और निर्दयी थे जो प्रजा को ,साधु लोगों को दिन रात कष्ट पहुँचाते थे।

द्वापर के अंत में सम्पूर्ण पृथ्वी पर  इसी प्रकार के राजाओं का राज था और चारों  तरफ पाप ही पाप किया जा रहा था। प्रजा दुखी और कष्ट में थी दुष्ट लोग मौज मना  रहे थे। धरती भी इन दुष्टो के कार्यों से दुखी हो गयी थी। तब भगवान के प्रेमी ,भक्तों ने ,सज्जनो ने भगवान से इनके नाश करने की प्रार्थना की। बुराई का नाश करने की प्रार्थना की ,धर्म की स्थापना करने की प्रार्थना की। 

राजा कंस की बहिन का नाम था देवकी। कंस देवकी से बहुत ही लाड प्यार और दुलार करता था। वह एक अच्छे भाई की तरह अपनी बहिन का ख्याल करता था। जब देवकी का विवाह वासुदेव के साथ हुआ तब कंस उसे विदा करने स्वयं ही चला और वासुदेव का रथ स्वयं ही ख़ुशी ख़ुशी हांकने लगा। उसका यह प्रेम देखकर सभी लोग उसकी भूरी भूरी प्रशंसा करने लगे। 

जब वह देवकी जी का रथ चला रहा था तभी आकाश में एक गंभीर आकशवाणी हुई जिसने कहा “जिस बहिन को तू इतने प्रेम से विदा करने जा रहा है ,उसी की आठवीं संतान तेरा काल बनेगी अर्थात वही तेरा अंत करेगा”,यह सुनते ही वह दुष्ट पापी पागल हो गया और अपने मयान से  तलवार निकाल कर अपनी बहिन देवकी का बध करने के लिए बढ़ा। 

तभी देवकी के पति वासुदेव ने कंस के पैर पकड़ कर उसकी स्तुति की , उसकी वीर गाथा कही तथा उससे देवकी को न मारने की प्रार्थना की। वासुदेव जी ने कहा कि ” देवकी आपकी छोटी बहिन है जो आपकी दुलारी भी है उसे मत मारिये ,आपको उसके पुत्रों से भय है न कि देवकी से , सो में उसके जन्मे प्रत्येक बच्चे को आपको सौंप दूंगा ,यह में आपसे प्रतिज्ञा करता हूँ, महाराज उसे छोड़ दीजिये”  

राजा कंस ने वासुदेव की प्रतिज्ञा का विचार करते हुए और उनकी सत्यता को समझते हुए उसने तलवार वापिस म्यान में रख ली। लेकिन उसे फिर वासुदेव पर विश्वास नहीं कर पाया। उसने दोनों को अपने कारावास में कैद कर दिया। जिससे वह देवकी की होने वाली प्रत्येक संतान पर नज़र रख सके।

लेकिन वह पापी दुष्ट कंस मौत से बुहुत ही डरता था इसलिए उसने देवकी से होने वाली प्रत्येक संतान की हत्या करता जाता था। जबकि आकाशवाणी  में आठवीं संतान से मृत्यु का भी था। 

समयानुसार ,भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अष्टमी की अर्द्धरात्रि में कारावास में देवकी को आठवीं संतान हुई लेकिन यह संतान स्वयं भगवान थे जो उस कारावास में  अत्यंत देदीप्यवान सांवले सूंदर बालक के रूप में प्रकट हुए। माँ देवकी ने भगवान् के इस रूप को देखकर हर्षित भी होती थी और दुखी भी होती थी कि कहीं कंस की नज़र न पड़  जाए,देवकी जी उस बालक को अपने  बस्त्रों में छुपाने लगीं की इसके प्रकाश से कहीं कोई सैनिक जग न जाए।  

भगवान् की अलोकिक शक्तियों से वासुदेव परिचित थे। भगवान् की प्रेरणा से वासुदेव जी कृष्ण जी को नंद के यहाँ गोकुल पहुंचाने का निश्चय किया और उसे उठाकर अपने सिर पर रखकर जाने लगे तब तुरंत ही उनके हांथों पैरों के बेड़ियाँ और  कारावास के दरवाज़े स्वयं ही खुल गए।

उस  मूसलाधार बारिश की काली रात्रि में पूरी मथुरा नगरी सोई हुई थी। सैनिक भी सोये हुए थे इसलिए बिना बाधा के वासुदेव जी नगर से बाहर आ गए। यमुना  भी उस समय खूब उफान पर थी लेकिन जैसे ही वासुदेव जी कृष्ण को लेकर यमुना के समीप आये तो यमुना का पानी कम हीनहीं हुआ वरन उसने उन्हें रास्ता भी दे दिया जिससे वो नदी के उस पार बड़ी ही आसानी से पहुंच जायँ। 

 

 
इस प्रकार से वासुदेव जी उस तूफानी भयानक रात में सकुशल गोकुल पहुंचे। उस रात में सारा गोकुल भी सोया हुआ था।सबके छुपते चुपचाप वासुदेव जी  नन्द बाबा के घर गए ,उस रात मैया यशोदा को भी एक पुत्री हुई थी। वासुदेव जी ने चुपके से अपने बालक श्री कृष्ण को उस कन्या के स्थान पर लिटा दिया और कन्या को उठाकर वहां से बड़ी ही सावधानी से नन्द के घर से निकलकर अपने मथुरा में आ गए। 
 
आते समय भी भगवान की प्रेरणा से सभी सैनिक और मथुरा वासी सोये हुए ही थे। वासुदेव जी जैसे ही अपने बंदी ग्रह में उस कन्या को लेकर पहुंचे तो पहले की तरह उनके और देवकी के हांथों और पेरो में बेड़ी लग गयीं और जेल के दरवाजे भी स्वतः ही पहले की तरह बंद हो गए। 
 
जिस समय श्री कृष्ण जी को वासुदेव जी अपने सर पर रख कर गोकुल जा रहे थे उस समय भरी बारिश हो रही थी। भगवान श्री कृष्ण बारिश से न भींगे तो  शेष भगवान जी ने उन पर अपने फनों से छत्र छाया करते रहे। जिससे भगवान श्री कृष्ण भीगे नहीं। और यमुना ने भी अपने प्रभु को पहचानकर उन्हें रास्ता दिया जिससे वासुदेव जी पानी में डूबे नहीं। 
 
उसके बाद उस कन्या ने रुदन शुरू किया। जैसे ही कन्या का रुदन शुरू हुआ तुरंत ही सभी सैनिक सोते हुए से जागे और तुरंत ही कंस को बच्चे के जन्म होने की सुचना दी। कंस बड़ी ही व्याकुल होकर बंदीगृह में आया और उस कन्या को देवकी जी की गोद से छीन लिया। तब देवकी जी ने रोते हुए कहा भाई यह तो कन्या है इसे तो मत मारो इसने क्या बिगाड़ा है ?आपको तो पुत्र से भय है। 
 
लेकिन कंस ने उस कन्या को पत्थर पर उठा कर पटक दिया। वह कन्या उसके हाथ से छूट कर आकाश में स्थित होकर नव देवी के रुप में प्रकट होकर कंस से बोली “रे दुष्ट !मुझ पर तू व्यर्थ ही शस्त्र उठाता है ,तेरा काल तो गोकुल में जन्म ले चूका है। जो समय आने पर तेरा नाश करेगा। “
 
यह सुनकर कंस भयभीत  हो जाता है और वह अपने अनुचरों और सहायकों को गोकुल में श्री कृष्ण को ढूढ़ने और उन्हें मारने का आदेश देता है। लेकिन वह अपने अनेक प्रयासों के बाबजूद श्री कृष्ण को नहीं मार पाता है। फिर वह दिन आता है जब वह श्री कृष्ण को बुलाकर धोखे से उन्हें मारने का प्रयास करता है। परन्तु श्री कृष्ण और बलराम कंस के इस मौत के खेल को खेल खेल ही में समाप्त कर देते हैं। और फिर श्री कृष्ण छलांग लगाकर उस कंस को उसके सिंघासन सहित नीचे पटक देते हैं और उस पापी के प्राण हर लेते हैं। मनुष्य और देवता भी इस कठिन कार्य के सम्पन होने से हर्षित होकर उन पर फूलों की वर्षा करते हैं और जय जय कार करके उनके गुण गाते हैं। 
 
यह सब कार्य कृष्ण जी ने अपनी मात्र सात वर्ष की आयु में ही किऐ थे । जिससे लोग उनके इस अलौकिक कार्य को याद् करके प्रसन्न होते हैं और प्रेम से आंसू बहाते हैं। इस प्रकार से श्री कृष्ण ने बुराई को मारकर अच्छाई को जीवित किया। सिर्फ मनुष्य ही नहीं देवताओं को भी श्री कृष्ण ने सुख दिया। अपने माता पिता को कारावास से छुडाया।मथुरा की प्रजा अति सुखी हुई कंस का  अंत होने से। 
 
इस प्रकार से भगवान ने और भी अनेक अलौकिक कार्य किये तथा इस पृथ्वीसे दुष्टों का नाश  और बुराई का अंत किया। अधर्मी लोगों को मारा और धर्म की ,सत्य की स्थापना की। इस प्रकार से जब जब पृथ्वी पर अत्यचार बढ़ता है ,अधम अभिमानी बढ़ जाते हैं मनुष्य कष्ट पाते हैं दुखी होते हैं ,अधर्म बढ़ जाता है तब तब भगवान किसी न किसी रूप में अवतार लेकर पृथ्वी से इसी प्रकर सभी बुराइयों का अंत करते हैं। 
 
 

जन्माष्टमी 2020 में कब है?

बैसे तो जन्माष्टमी हर साल अगस्त या सितम्बर के महीने में मनाई पड़ती  है। लेकिन फिर भी भादों का महिना आते ही हम सब के मन में बस एक ही सवाल आता है की  कृष्ण जन्माष्टमी कब है? और किस दिन है?

सभी बच्चे भी बड़े ही उत्साह से पूछते हैं कि श्री कृष्ण जन्माष्टमी आज है या कल? तो हम आपको बता दें की इस वर्ष  कृष्ण जन्माष्टमी 2020 में 11 अगस्त मंगलवार को मनाई जाएगी बड़े ही धूमधाम से हर्सोल्लास के साथ अपने अपने घरो में ,मंदिरों में मनाई जायगी। और हमेशा की तरह सबसे पहले मंदिरों में मनाई जायगी और फिर उसके बाद अपने अपने घरों में  श्री कृष्ण का जन्मदिवस मनाया जायगा।

भगवान श्री कृष्ण जी का जन्म रात के 12 बजे हुआ था।  हिन्दू कैलेंडर के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी भादों  माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन रोहिणी नक्षत्र में पड़ती है। कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव को पूरी दुनिया में बड़ी आस्था और श्रद्धा भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर देश व विदेश से प्रतिवर्ष हजारों लाखों श्रद्धालु भगवान कृष्ण का जन्म दिन मानाने के  लिए मथुरा जाते हैं। 

कृष्ण जन्माष्टमी कैसे मनाते हैं?

कृष्ण जन्माष्टमी के आगमन से पहले ही उसकी तैयारियाँ पुरे जोर-शोर से आरंभ कर दी जाती हैं। पुरे विश्व में इस त्यौहार का उत्साह और ख़ुशी देखने योग्य होता है। 

कृष्ण जन्माष्टमी के दिन मंदिरों को खूब सजाया जाता है।  कृष्ण जन्माष्टमी से एक दिन पहले सप्तमी के दिन लोग पूरा दिन व्रत रखते हैं और आधी रात 12 बजे मंदिरों में कृष्ण का जन्म होने के बाद घंटियाँ ,शंख , ढोल आदि संगीत बजाकर श्री कृष्ण की जन्माष्टमी आरती की जाती है तथा भजन कीर्तन किये जाते हैं। 

अधिकतर  लोगो का ये सवाल होता है की कृष्ण जन्माष्टमी में क्या खाना चाहिए?कृष्ण जन्माष्टमी में बहुत से श्रद्धालु भक्त निर्जल उपवास रखते हैं और रात्रि 12 बजे  भगवान् का जन्म  के बाद ही अपना उपवास तोड़ते हैं। वहीँ बहुत से भक्त बिना निर्जल उपवास रखते हैं , धान और नमक का त्याग कर व्रत रखते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी  व्रत में भक्त सेंधा नमक से बनी साबूदाने की खिचड़ी और साबूदाने की खीर , दही वडा, समक चावल के खीर, इत्यादि फलाहार चीजें भी खा सकते हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी के दिन व्रत रखने से भगवान् की कृपा और घर में सुख-समृद्धि और शांति आती है।  इस दिन मंदिरों में और घरों में तरह तरह की झाकियाँ सजाई जाती हैं  और भगवान श्री कृष्ण को झुला भी झुलाया जाता है। 

कृष्ण जन्माष्टमी का असली  उत्सव मध्यरात्रि के दौरान शुरू होता है क्योंकि श्रीकृष्ण का जन्म अपने मामा कंस के कारावास में मथुरा नगरी में आधी रात्रि में  हुआ था। पूरे भारत में इस दिन को भक्ति गीतों और नृत्यों, पूजाओं, आरती, शंख की ध्वनि और संगीत के साथ  श्रीकृष्ण की पालकी के साथ मनाया जाता है। 

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन भारत में जगहों  जगहों पर दही-हांडी प्रतियोगिता का आयोजन  भी किया जात है।  इसमें नन्हे बालक श्री कृष्ण की भेषभूषा पहनकर गोविंदा बनकर  मटकी फोडने जाते हैं। और लोग इस प्रतियोगिता का आनंद देख देख कर आनंद लेते हैं। इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन की कृष्ण जन्माष्टमी विश्व प्रसिद्द है जिसे देखने व कृष्ण जी के अद्भुत दर्शन कने लोग देश विदेश से आते  हैं। 

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन प्रायः सभी विद्यालयों, संस्थाओं आदि में कृष्ण जन्माष्टमी का अवकाश मनाया जाता  है।  इस दिन , दिन भर अलग अलग स्थानों पर विद्वानों,पंडितों ,संतों  के प्रवचन, श्रीमद्भागवत की कथा और जन्माष्टमी की कथा और इस अवसर पर भजन कीर्तन, उपदेश आदि सुनने को मिलतें है। 

कृष्ण जन्माष्टमी  वर्ष में एक बार भादों की पावन वर्षा  ऋतू में आकर यह त्यौहार हम सभी के मन में धर्म ,सदाचार अच्छे विचारों की स्थापना तथा अधर्म ,अत्याचार-पापाचार के विनाश के लिए सीख देता है तथा सच्चे कर्तव्य के लिए सभी को प्रेरित करता है। 

>रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है पुराणों के अनुसार

कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व

हिन्दू धर्म में हर त्यौहार और हर व्रत का अपना बिशेष महत्व होता है उसी तरह जन्माष्टमी का भी विशेष महत्व है।  धरती से पापों , अत्याचार और हिंसा आदि को मिटाने के लिए श्री कृष्ण जी ने पृथ्वी पर अवतार लिया था। जब कंस का अत्याचार और पाप अपनी चरम सीमा पर पहुँचे तब कृष्ण जी ने उसका वध करके मानव जीवन और धर्म की रक्षा की थी। 

तो इस प्रकार से कृष्ण जन्माष्टमी पर्व हमें सच्चाई, अहिंसा और धर्म के पालन करने का सच्चा संदेश देता है। यह त्यौहार श्री कृष्ण के दिखाये गए मार्ग ,कर्तव्यों  पर चलने और उनके आदर्शों का पालन कर मानवजाति के उत्थान के लिए ,कल्याण के लिए ,सच्चे सुख व आंनद के लिए इस जगत को प्रेरित  करता है। 

यह कृष्ण जन्माष्टमी  हमें जहाँ एक और श्री कृष्ण के बाल रूप की अद्भुत अलौकिक लीलाओं का स्मरण कराता है साथ ही अपना उचित अधिकार पाने के लिए कड़े संघर्ष और कर्म के महत्व की सीख भी देता है। 

भगवान श्री कृष्ण जन्मदिवस की याद में और उनके बाल रूप को पूजने के लिए यह पावन पर्व कृष्ण जन्माष्टमी मनाया जाता है। 

जन्माष्टमी पर निबंध हिंदी में” कृष्ण जी के जन्म की कथा आदि अच्छे से समझ आया होगा। इसे आप अपने बच्चों  तथा  ज्यादा से ज्यादा लोगों के साथ जरुर जरुर शेयर करें ताकि उन सबको भी कृष्ण जन्माष्टमी की इस अद्भुत अलौकिक कहानी की सही जानकारी मिल सके और उसका असली महत्व समझ सकें।  

 

रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है पुराणों के अनुसार

हमारा देश भारत त्योहारों और खुशियों की वो स्थली है जहाँ पर दुनिया के सबसे ज़्यादा पर्व और त्यौहार मनाये जाते हैं। यह ऐसी भूमि है जहाँ पर हर एक त्यौहार बड़े ही उत्साह और हर्षोउल्लास एवं खुशियों के साथ मनाया जाता है. बैसे तो भारत एक विभिन्न संस्कृतियों का संगम है लेकिन यहां प्रत्येक मौसम के साथ साथ अनेक त्यौहार एक के बाद एक आते ही रहते हैं और मनाये ही जाते हैं। और जिनका मनाने का एक अपना अलग ही मज़ा होता है। 

प्रत्येक त्यौहार की अपनी अपनी रीती रिवाज हैं मान्यताएं हैं जिन्हें लोग बहुत ही खुशी के साथ पूरा भी करते हैं। भारत में त्यौहार सिर्फ त्यौहार नहीं हैं वो एक खुशियों का,आनंद , हर्षोल्लास तथा कभी कभी मस्ती का भी पिटारा है जिसके आने पर सब ख़ुशी से भर जाते हैं। चेहरे चमकने लगते हैं एवं गॉंव गॉव ,नगर नगर सभी दमकने लगते हैं। 

तो ऐसे ही खुशियों से भरा सबसे पवित्र त्यौहार है जो साल के सावन के महीने की पूर्णिमां को मनाया जाता है जिसका नाम है “रक्षाबंधन” जो बड़ी ही धूम धाम से मनाया जाता है। 
 
रक्षाबंधन त्यौहार भारत के बड़े त्योहारों  में से एक है जो भाई -बहिन के पवित्र प्रेम और कर्तव्य का प्रतीक माना जाता है। 
 
यह वो दिन होता है जिस दिन हर बहन अपने भाई की कलाई में रक्षा का सूत्र बाँधती है जो पवित्रता, शुद्धता और अटूट बंधन का प्रतीक होता है। रक्षाबंधन प्रमुख रूप से  हिन्दुओं का पर्व है। यह परंपरा हमारे भारत में सदियों से प्रचलित है और इसे श्रावण पूर्णिमा का बहुत बड़ा त्यौहार माना जाता है। 
 
 हम सालों से इस त्यौहार को अनादपूर्ण मनाते आ रहे हैं लेकिन क्या आपको इस त्यौहार से जुड़े सभी चीजों के बारे में जानकारी है? जैसे- रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है? रक्षा बंधन की उत्पत्ति कैसे और कहाँ से हुई? रक्षा बंधन कब मनाया जाता है?तो दोस्तों इन सभी सवालो के जवाब मैं इस लेख रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है पुराणों के अनुसार  के माध्यम से बताने जा रहा हूँ :
 

रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है पुराणों के अनुसार?

रक्षा बंधन जिसे राखी भी कहा जाता है। यह  त्यौहार सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाता है।  इस रक्षा बंधन पर विशेष रूप से बहने अपने भाई के कलाई में राखी बाँधती है और उनके लिए लम्बी आयु की कामना भी करती है। 
 
और भाई भी अपनी बहन की हमेशा रक्षा करने का वचन बहिन को देता है। ऐसा मान्यता है कि राखी के रंगबिरंगे धागे से भाई बहन के पवित्र प्यार के बंधन को और भी मजबूत करते हैं कभी न टूटने वाले बंधन में।  यह वो पवित्र त्योहार है  जो  भाई बहन के पवित्र रिश्ते को पूरा आदर और सम्मान देता है। 
 
बैसे तो यह त्यौहार मुख्य रूप से हिन्दुओं का त्यौहार है परन्तु इसे भारत में सभी धर्म के लोग उसी उत्साह के साथ मनाते हैं। रक्षाबंधन इसलिए भी खास है क्योकि यह पारवारिक मेल मिलाप भी बढ़ाता है साथ ही भाई बहिन के रिश्ते को और भी गहरा बनाता है।  
 
इस पावन पर्व पर परिवार के सभी सदस्य साथ इक्कठे होते हैं,मिठाई ,पकवान आदि बनाये जाते हैं । विवाहित बहने ससुराल से मायका अपने भाई को राखी बाँधने आती है। 
 
भाई भी अपनी बहिन से राखी बंधवाने के लिए दूर दराज देश से अपने घर आते हैं जिसमें देश के सैनिक सबसे अधिक खास  होते हैं, जो दिन रात देश की रक्षा करने में लगे रहते हैं। इस तरह घर की रौनक बढ़ जाती है और जो लोग सालों से एक दुसरे से दूर रहते हैं उन्हें भी एक दुसरे के करीब आने का मौका मिल जाता है। 
 
इस तरह रक्षाबंधन के दिन परिवार सभी सदस्य एक हो जाते हैं और राखी, उपहार और मिठाई देकर अपना प्यार शेयर करते हैं। 

रक्षाबंधन की रूपरेखा – रक्षाबंधन पर बिशेष निबंध

यह त्यौहार केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी उसी उत्साह के साथ मनाया जाता है जैसे नेपाल और मौरीसिअस। दुसरे बड़े बड़े देशों में जहाँ भारतीय लोग रहते हैं वहां पर भी रक्षाबंधन का पर्व  खूब जोर शोर से मनाया जाता है जैसे – UAE ,USA ,UK ,CANADA ,ऑस्ट्रेलिया। 
 
भारत में रक्षा बंधन के त्यौहार को अलग  अलग राज्यों में अन्य नामो से भी जाना जाता है।  जैसे की उत्तरीय दिशा और पश्चिमी भारत में रक्षा बंधन के त्यौहार को लोग “राखी पूर्णिमा” के रूप में मनाते हैं। 
 
और इसी दिन दक्षिणीय भारत में इस पर्व को “अवनी अवित्तम” या “उपकर्मम” के नाम से मनाया जाता है। जबकि पश्चिमी घाट के क्षेत्र में राखी के पर्व को “नारियल पूर्णिमा” कहा जाता है। 
 
अब सवाल यह आता है कि रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है इसके पीछे क्या कहानी है पुराणों  के अनुसार? रक्षाबंधन एक सामाजिक, पौराणिक, धार्मिक और एतिहासिक वजहों से केवल भारत में ही नहीं बल्कि पुरे विश्व में सदा से प्रचलित है। पुराणों के अनुसार रक्षाबंधन त्योहार मनाने के पीछे बहुत सी पौराणिक कथाएँ हैं जो इस रक्षाबंधन त्यौहार का इतिहास बताती  हैं।  
 

पुराणों के अनुसार रक्षाबंधन की कहानी

कुछ पुराणों के अनुसार एक प्रचलित कहानी कि रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है इस प्रकार से है :

एक समय की बात है पृथ्वी पर दैत्यों का एक राजा था जिसका नाम था बलि जो बहुत ही बलवान और धर्मपरायण था। साथ ही भगवन विष्णु का भक्त भी था। शुरवीर होने के साथ बड़ा दानी भी था। वह कभी भी अपने द्वार से किसी भी मांगने वाले को खाली हाँथ नहीं जाने देता था। 
 
राजा बलि की दानवीरता तीनों लोकों में व्याप्त थी। एक समय जब दैत्यों का राजा  बलि अश्वमेघ यज्ञ कर रहा था। तो देवताओ के राजा इंद्र को अपने राज्य और लोक जाने  का भी सताने लगा और साथ ही चिंतित भी रहने लगा की कैसे इस दैत्य को रोका जाए क्योकि वह भगवन विष्णु का उपासक भी था। 
 
इंद्र का और बलि का घोर युद्ध हुआ जिसमें इंद्र की हार हुई और बलि स्वर्ग का राजा बन गया। तब इंद्र ने अपनी माता अदिति से  प्रार्थना की कि मेरी और मेरे शासन की रक्षा करो। 
 
तब माता अदिति ने भगवन विष्णु से प्रार्थना की मेरे पुत्र होकर आप इस दैत्य से मेरे पुत्र इंद्र और उसके साम्राज्य की रक्षा करें। तब प्रभु नारायण ने बहुत ही अच्छा कह वामन रूप से अवतार लिया। 
भगवन वामन अर्थात विष्णु जी साधु से भेष में राजा बलि के द्वार पर पहुंचे। राजा बलि उस समय पूजा करके ही निवृत हुआ था। तभी द्वार पर साधु बालक की बात सुनकर राजा द्वार पर पहुंचा। बलि ने देखा कि द्वार पर एक अद्भुत सौंदर्य का स्वामी एक साधु बालक खड़ा हुआ है जिससे देखकर राजा बलि मंत्रमुग्ध सा खड़ा साधु को देखता ही रह गया। 
 
उसके मन में विचार आया कि भला कोई इतना भी सूंदर हो सकता है। यह तो मुझे अपने स्वामी हरि ही नजर आते हैं जैसे वो ही मेरी प्रार्थना स्वीकार कर मेरे द्वार पधारे हों। 
 
राजा ने यही सोचते हुए कि यह मेरे प्रभु ही आये हैं उनकी पूजा अर्चना स्तुति की उसके पश्चात उन्हें आसान दिया। राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य यह बात जान गए कि भगवन हरि ही हैं। उन्होंने राजा को इस साधु बालक को कुछ भी न देने की सलाह दी। 
  
परन्तु राजा ने कहा कि यदि यह स्वयं भगवान हैं तो यह मेरे लिए परम् सौभाग्य की बात है। दूसरी बात यह कि में तीनो लोकों में प्रसिद्ध दानी हूँ और मेरी यह सदा से प्रतिज्ञा है कि कोई भी मेरे द्वार से खाली नहीं जाएगा। फिर वह दुश्मन ही क्यों न हो ?
 
राजा बलि ने साधु से कहा कि प्रभु आप दान दक्षिणा में क्या लेंगे ?तो साधु बालक वामन जी ने कहा  कि मुझे सिर्फ अपने तीन पग धरती  चाहिए। इस पर राजा बलि हंसे और बोले ” हे साधु ! आप तो निरा बालक ही हैं ,भला तीन पग आपके लिए कितनी सम्पति या जमीन होगी”। परन्तु साधु बालक ने कहा मुझे सिर्फ इतना ही चाहिए। राजा बलि ने कहा मेरी सब सम्पत्ति आपकी ही है आप जो चाहे मांग सकते हैं भला इतने में क्या होगा। 
 
लेकिन जब साधु बालक नहीं माने तो राजा ने मन में सोचा बालक हट है एक बार जो मन को ठीक लगे वही करते हैं। उसके बाद राजा तीन पग धरती देने जो तैयार हुआ तो समय भी उसके गुरु ने रोका कि बलि अब भी वक्त है घमंड में मत डुबो। 
 
लेकिन बलि ने बात नहीं सुनी और संकल्प कर दिया बामन के लिए। तब साधु बालक से कहा कि “हे स्वामी अब आप  तीन पग जहाँ चाहे वहां से नाप लीजिये”। तब साधु बालक आसान से उठ खड़े हुए और मुस्कराये। 
 
भगवान वामन जी ने अपना बिक्रम रूप धारण किया  और  भगवन ने  अपने  पग से पूरी धरती नाप ली और दूसरे पग से स्वर्ग भी नाप लिया लेकिन तीसरे पग के लिए अब कोई  जगह ही नहीं बची थी। 
 
तब साधु  ने कहा कि मेरे लिए तीसरा पग के लिए जगह बताओ राजा बलि ने हाथ जोड़ कर बैठते हुए कहा कि “प्रभु अपना तीसरा पग मेरे सर पर रखिये ” और कुछ अब मेरे पास नहीं है सिवाय इस शरीर के साधु बालक ने अपना पैर राजा बलि के  सर पर रखा तो बलि अपने शरीर सहित पृथ्वी के नीचे के लोक रसातल को चला गया। 
 
भगवन ने बलि की ऐसी श्रद्धा भक्ति  देखकर बलि से कहा “हे दैत्य में तुझसे बहुत प्रसन्न हूँ ,तुझ जैसा दानवीर आज तक पैदा ही नहीं हुआ है ,तुम जो चाहो वो वर मुझसे मांग सकते हो “
 
राजा बलि  ने कहा कि आपके दर्शन मात्र से  मेरी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो गयीं हैं। प्रभु यदि मुझे यदि देना ही चाहते हैं तो बस अपनी भक्ती दीजिये और दूसरा वर में यह मांगता हूँ की आप मुझे छोड़कर कभी न जाएँ। 
 
तब भगवन ने प्रसन्न होते हुए कहा कि बलि “तथास्तु ” उसके भगवन बोले हे दैत्य ! तू  सदा दानियों में अग्रगण्य रहेगा तथा शास्त्रों में पूजन में भी दानी के रूप में तुझे पूजा जाएगा और अगले कल्प का इंद्र भी तू ही होगा। 
 
और तेरी भक्ति के कारन में तुझे छोड़कर कभी नहीं जाऊंगा तेरे दरवाजे पर ही रहूँगा इस साधु के बेष में। और यही कारण है कि जब भी कोई साधु पूजन करते समय धागा बांधता है तो  “दानवेन्द्रो राजा महाबली”का नाम उच्चारण करता है। अर्थार्त दान वीर में महाबली के सामान हो। 
 
कही कही ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि जब प्रभु दानवीर राजा के यहाँ ही ठहर गए तो स्वर्ग के देवता आदि सब बड़े चिंतित हो गए कि अब हम लोगों का क्या होगा ?यह इंद्र ने क्या करवा दिया ? तब सभी देवता ,ऋषि ,मुनि आदि सब ब्रह्मा जी के साथ माँ लक्ष्मी के पास गए और बोले कि आप ही हैं जो प्रभु को वापिस यहाँ ला सकती हैं। 
 
तब देवताओं के बहुत विनय प्राथना करने पर माँ लक्ष्मी रसातल गयीं और महाबली से प्रभू को माँगा तो बलि ने पहले तो स्वीकारा ही नहीं लेकिन बाद में उनकी इस बात से कि आप प्रत्येक साल की इस पूर्णिमा को मेरे घर पर आप दोनों साथ अवश्य आया करें। 
 
आप मेरा आथित्य स्वीकारा करें और आप मुझ दास का यह आग्रह  एक भाई के रुप में  ही स्वीकार कर लें। तब लक्ष्मी जी ने वचन देते हुए अपना आभूषण हाथ में पहना दिया। 
 
जिस दिन लक्ष्मी जी ने राजा बलि को अपना भाई बनाया था उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा की तिथि थी।  तभी से हर श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन बहन अपने भाई को राखी बाँधती है। तब से ही यह रक्षा बन्धन का पर्व भी प्रारम्भ हुआ ,ऐसा माना जाता है । ऐसी बहुत सी कथाएँ प्रचलित हैं जहाँ से रक्षा बंधन प्रथा की उत्पत्ति का व्याख्या मिलती है। 
 

रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है ? Why Raksha Bandhan is Celebrated in Hindi

आखिर रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है इसका अच्छा उल्लेख महाभारत के श्री कृष्ण और द्रौपदी की कहानी में भी मिलता है- 
 
एक बार जब दुष्ट शिशुपाल ने श्री कृष्ण भगवन की  भरी सभा में अपमान की सभी हदें पार कर दीं  तब भगवन ने  सुदर्शन चक्र छोड़कर उस दुष्ट का अंत कर दिया। चक्र छोड़ते समय कृष्ण जी के ऊँगली छोटा सा खरोच होने से खून निकल  आया था तब तुरंत ही द्रोपदी जी ने एक बहिन का कर्तव्य निभाते हुए अपने साड़ी से थोड़ा सा भाग चिर कर प्रभु जी के ऊँगली में बांध दिया था। 
 
तब भगवन श्री कृष्ण ने भी उस भरी सभा में कहा कि ऐसे समय में भगिनी द्रोपदी ने अपना कर्तव्य निभाया है। में कृष्ण भी वचन देता हूँ कि द्रोपदी की भाई का कर्तव्य होते हुए में उसकी सदैव रक्षा के लिए तैयार रहूँगा। वह जब भी मुझे पुकारेगी तब तब में उसकी रक्षा के लिए सदैव खड़ा ही रहूँगा। 
 
इसके कुछ दिन पश्चात् ,एक दिन पांचों पांडव जुए में अपनी द्रोपदी को हार जाते हैं तब दुष्ट दुशासन द्रोपदी का भरी सभा में  चीर हरण करने का निंदनीय घोर महापाप करता है। 
 
जब द्रोपदी जी ने देखा कि इस भरी सभा में कोई उसकी लाज नहीं बचा सकता तब उन्होंने  श्री  कृष्ण को पुकारा। श्री कृष्ण ने तुरंत ही वस्त्रों के रूप में प्रकट हो गए, जिस पर  दुष्ट दुशासन थक कर हार गया वस्त्र खींचते खींचते जबकि उस दुष्ट  में पूरा एक हजार हाथियों का बल था। 
 
पूरी सभा आश्चर्य में पड़ गयी कि  “नारी है या साड़ी है या नारी बिच साड़ी है या साड़ी की ही नारी है”  वस्त्रो का पर्वत सा बन गया और इस तरह द्रोपदी बहिन की लाज बचाई भगवन श्री कृष्ण ने। उस समय से लेकर अब तक बहन भाई को राखी बाँध रही है और भाई भी उनको उनकी रक्षा का वचन देते हैं। 
 

रक्षाबंधन किस Date या तारीख को है? रक्षाबंधन 2020 में कब है?

जैसी ही वर्षा ऋतू का आरंभ होता है , सबके मन में बस एक ही सवाल आता है कि इस बार  रक्षा बंधन कब है? यूँ तो तिथि के अनुसार हर साल रक्षा बंधन श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है जो आम तौर पर अगस्त के महीने में ही पड़ता है। 
 
इस साल भी  रक्षा बंधन 2020 में 3 अगस्त सोमवार के दिन पड़ रहा है। अर्थात 3 अगस्त सोमवार को ही यह प्यारा पवित्र त्यौहार मनाया जायेगा। 
 
यह जानना भी जरुरी है कि रक्षाबंधन बांधने का सही समय या  सही मुहूर्त क्या है ? अर्थात  राखी बांधने का शुभ समय क्या है ?इस साल रक्षा बंधन का शुभ मुहूर्त सुबह 09:28 से लेकर शाम के 09:14 बजे तक रहेगा, इस दौरान कभी भी बहन अपने भाई को राखी बाँध सकती है। 
 
अच्छा क्या आप सभी जानते  हैं कि 15 अगस्त को रक्षाबंधन अब तक कितनी बार मनाया जा चूका है मतलब 15 अगस्त और रक्षाबधन कितनी बार अब तक साथ साथ मनाये गये हैं ?
 
1947 से लेकर अब तक  रक्षा बंधन की तिथि सन 1962, 1981 और 2000 के वर्ष में स्वतंत्रता दिवस के साथ मनाया जा चूका है एवं 2019 में भी रक्षाबंधन 15 अगस्त को ही मनाया गया था। 1947 से लकेर अब तक रक्षाबंधन 15 अगस्त के साथ 4 बार मनाया चूका है। 
 

रक्षा बंधन के दिन क्या क्या किया जाता है
तथा इसे कैसे मनाते हैं ?

रक्षा बधंन भाई बहिन के पवित्र रिश्ते का प्रसिद्ध त्यौहार है , रक्षाबंधन का मतलब होता है रक्षा का बंधन। रक्षा मतलब सुरक्षा , केयर ,बचाव और बंधन का मतलब है जुड़ना  , मजबूत सच्चा रिश्ता होना । 
 
तो इस दिन भाई अपनी बहिन की सुरक्षा का , उसके केयर का वचन देता है कि उम्र भर अपनी बहिन की सुरक्षा पर किसी प्रकार की  आंच नहीं आने देगा। इसलिए इस दिन राखी मतलब रक्षासूत्र का ही मुख्य महत्व होता है। 
 
रक्षाबंधन त्यौहार के दिन घर के सभी सदस्य सुबह जल्दी उठ जाते हैं और रक्षा बंधन की तैयारियों शुरू करने लगते हैं। प्रत्येक परिवार में खूब चहल पहल रहती है ,सभी में ख़ुशी और हर्षोल्लास का माहौल रहता है। तरह तरह के पकवान व मिठाई बनायीं जाती हैं। कुछ बहिने तो स्वयं अपने हाथ से भाई के लिए मिष्ठान बनाती हैं। कुछ बाजार से मँगवाती हैं। 
 
चलिए अब जानते हैं कि कैसे इस त्यौहार पर थाली सजाते हैं  या उसका क्या सही तरीका है ? इस दिन प्रातः स्नान कर लड़कियां और महिलाएं नए वस्त्र धारण कर पूजा की थाली सजाती हैं, थाली में राखी के साथ, हल्दी, कुमकुम, चावल के दाने, दीपक, मिठाई, गंगाजल रखती है। 
 
थाली आप समान्य ले सकती हैं या फिर बाज़ार में उपलब्ध अच्छे डिज़ाइन की रंगबिंरगी थाली भी पूजा में ले सकती हैं। रक्षाबंधन पावन पर्व धार्मिक क्रिया की शुरुआत  थाली में दीप जलाकर किया जाता है। 
 
उसके बाद बहने राखी की सजी हुई थाली लेकर सबसे पहले भाई के माथे पर तिलक लगाती हैं , चावल छिड़कती हैं , सर पर फूल बरसाती हैं। उसके बाद भाई की आरती  उतारती हैं और भाई की लम्बी उम्र की कामना करती हैं   , उसके बाद भाई की दाहिनी कलाई पर सुनदर सूंदर रक्षासूत्र बांधती हैं जो या तो बहिन ने स्वयं बनाये होते हैं या फिर बाजार से खरीद कर लाती हैं। 
 
राखी बांधने के बाद भाई को मिठाई आदि खिलाकर मुँह मीठा कराती हैं। उसके पश्चात् भाई बहिन को कुछ उपहार देते हुए पैर छूकर उसकी रक्षा करने का वचन देता है। लेकिन कहीं  कहीं छोटी भीं बड़े भाई को राखी बांधकर पैर छूती हैं और भाई का आशीर्वाद लेती हैं। 
 
इस दिन की खास बात यह भी होती है कि जब तक बहिन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र नहीं बांध देती है तब तक  वह उपवास रखती है। 
 
रक्षाबंधन के लगभग 10  दिन पहले से ही बाजारों में रंग बिरंगी रक्षासूत्र बेचे जाने लगते हैं।रक्षाबंधन के दिन बाज़ार में कई सारे उपहार भी बिकते हैं। अच्छे अच्छे  उपहार और नए कपडे खरीदने के लिए बाज़ार में लोगों की सुबह से शाम तक खूब भीड़ रहती  है , इस दिन बजार में मिठाईयों की दुकान पर भी काफी भीड़ देखने को मिलती है क्योंकि बहुत सी  बहनें अपने भाइयों के लिए भिन्न भिन्न प्रकार की मिठाइयाँ खरीदती है। 
 
बहुत से लोगों के मन में यह सवाल भी हो सकता है कि यह त्योहर कितने दिन तक मनाया जाता है ? रक्षा बंधन का यह त्यौहार सावन पूर्णिमा से लेकर भादों की अष्टमी मतलब कृष्ण जन्मास्टमी तक मनाया  जाता है मतलब रक्षा बंधन से लेकर 8 दिन तक बहिने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं। 
 
यदि ऐसे में कोई भी भाई  दूर कहीं है घर से तो वह इन दिनों के मध्य  में भी आकर बहिन से राखी बंधवा सकता है और इस तरह वो राखी का त्यौहार  मना सकते हैं। 
 

रक्षा बंधन पर बहन के लिए कविता

बड़ा ही अनोखा है यह रक्षा का बंधन 
ओ बहिना तू है मेरी घर का कुंदन। 
पुष्प दीप सजाकर थाली में 
आई बहिना भाई का करने पूजन 
 सदा लम्बी हो उम्र तेरी भैया मेरे 
हर रोज यही  दुआ करूँ रब से 
मिले तुझे वो जो तेरा मन चाहे 
तेरी यश कीर्ति संसार में छा  जाये 
जहां की सारी खुशियां मिले तुझे बहिना 
कभी भूले कोई दुःख न  आए तेरे अंगना 
यह भाई अपना दायित्व कभी भूले न 
यही याद दिलाने आता है रक्षा बंधन 
लाख भी आये परेशानी जीवन में 
पर जीवन भर संग अपना साथ छूटे न 
 

रक्षा बंधन के लिए शायरी

“रिश्ता है यह सबसे सूंदर और सादा
बहन बांधे है राखी, भाई करे है वादा
बहन और भाई का प्यार है पवित्र सच्चा
इसलिए माना जाता है यह रिश्ता सबसे अच्छा.”
यह रक्षाबंधन त्यौहार भाई और बहन के बीच प्यार और मधुर संबंध को दर्शाता है। दोस्तों इस साल आप भी अपने बहन और भाई को राखी के मौके पर खूब सारा प्यार दें और उसकी केयर करें , सदा उसे बुरे मार्ग और बुराइयों से बचाएं।  यह भाई की जिम्मेदारी होती है कि वह अपनी छोटी बहिन  का पिता के समान पग पग पर सपोर्ट करे उसका ख्याल रखे। 
 
दोस्तों इस बार कोरोना महामारी के चलते यह त्यौहार शायद ही उतने हर्षोल्लास और ख़ुशी के साथ  मना पाएंगे जितना की हर वर्ष मनाते हैं। मेरे प्यारे दोस्तों हम सभी मिलकर  ईस्वर से प्रार्थना करें कि इस महामारी से जल्दी ही समस्त संसार को मुक्ति मिले। और लोग पहले की तरह हंस खेल पाएं और साथ में खुशियां मना पाएं। 
 
दोस्तों मुझे उम्मीद है कि आपको ये लेख “रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है पुराणों के अनुसार” पसंद आया होगा। दोस्तों यदि आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे अपने दोस्तों, भाई और बहनों के साथ जरुर शेयर करें।दोस्तों अपना ख्याल रखें साफ सफाई और सोशल डिस्टैन्सिंग का सावधानी पूर्वक पालन करें , जहां भी रहें सुरक्षित रहें। आप सभी को भी आप और आपके परिवार को रक्षाबंधन की ढेर सारी शुभकामनायें।